इत्तिबा-ए-सुन्नत का एहतिमाम – ११

हज़रत मौलाना अशरफ़ ‘अली थानवी रहमतुल्लाही ‘अलैह

हज़रत हकीमुल-उम्मत मौलाना अशरफ़ ‘अली थानवी रहमतुल्लाही ‘अलैह हाल के ज़माने के एक बहुत बड़े आलिमे-दीन और बुज़ुर्ग थे। हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह सन १२८० हिजरी में थाना भवन में पैदा हुए और १६ रजब १३६२ हिजरी (मुताबिक २० जुलाई १९४३) को ८३ साल की उम्र में वफ़ात पा गए।

हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह अभी छोटे ही थे कि उनकी वालिदा-माजिदा अल्लाह को प्यारी हो गई; लिहाज़ा उनके वालिद-माजिद ने उनकी परवरिश की।

अल्लाह त’आला ने हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह को बचपन ही से तक़्वा (परहेज़गारी) से नवाज़ा था; चुनांचे हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैहि के बारे में मन्क़ूल है कि वह बारह साल की उम्र से ही तहज्जुद की नमाज़ के पाबंद थे।

अल्लाह त’आला ने हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह को दीन की ख़िदमत के लिए क़बूल फ़रमा लिया था; यही वजह है कि हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह ने दीन के मुख़्तलिफ़ (अलग-अलग) उलूम व फ़ुनून में तक़रीबन एक हज़ार किताबें तस्नीफ़ (लिखीं) फ़रमाई हैं, जिनमें तफ़्सीर, हदीस, तसव्वुफ़, फ़िक़्ह, तजवीद वग़ैरह शामिल हैं। यह इस बात की खुली दलील है कि अल्लाह त’आला ने हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह के वक़्त में बेपनाह बरकत रखी थी।

जब हम हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह की ज़िंदगी का जाइज़ा लेते हैं, तो हमें मालूम होता है कि हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह शरीअत पर मज़बूती से क़ायम रहते थे और पूरे एहतिमाम व पाबंदी के साथ रसूले-करीम सल्लल्लाहु ‘अलैहि व-सल्लम की मुबारक सुन्नतों पर अमल करते थे। इसी वजह से अल्लाह त’आला ने उन्हें दुनिया भर में मक़बूलियत अता की थी।

नीचे हम हज़रत रह़्मतुल्लाही ‘अलैह की ज़िंदगी के चंद ऐसे वाक़ियात ज़िक्र करेंगे, जिनसे हम अंदाज़ा लगा सकेंगे कि सफ़र के दौरान हज़रत का तर्ज़े-अमल (काम का तरीका/बर्ताव) क्या था और अल्लाह के इस अज़ीम वली ने हर लम्हा शरीअत व सुन्नत को किस तरह क़ायम रखा।

कुलियों को मुनासिब मज़दूरी देना

सामान उठवाने से पहले ही हज़रत कुलियों से उजरत (मज़दूरी) तय फ़रमा लेते, फिर सामान उठवाते; क्योंकि आप (उस ज़माने की) रेलवे की तय की हुई (सरकारी) उजरत पर सामान उठवाना जाइज़ न समझते थे। आप फ़रमाया करते थे कि दस्तूर कोई चीज़ नहीं है, बल्कि मज़दूर को खुश करना ज़रूरी चीज़ है। (सीरते-अशरफ़, पेज २१०)

लगेज चार्ज देना

आप बिला अदा-ए-महसूल (बिना लगेज चार्ज चुकाए) कोई चीज़ रेलवे से न ले जाते। अगर ज़रा भी किसी चीज़ में शक होता कि यह तय वज़न से ज़्यादा होगी, तो आप उसे फ़ौरन वज़न कराते और उसका महसूल अदा करते।

इसका इतना एहतिमाम था कि एक मर्तबा सहारनपुर से कानपुर जाते हुए कुछ गन्ने साथ थे। जब टैक्स चुकाने के लिए उसे तुलवाने लगे, तो कोई तोले नहीं; यहां तक कि रेलवे के ग़ैर-मुस्लिम मुलाज़िम (कर्मचारी) भी कहने लगे कि: “हज़रत! आप इसे यूं ही ले जाइए, तुलवाने की ज़रूरत नहीं है। हम गार्ड से कह देंगे।”

हज़रत ने फ़रमाया: “यह गार्ड कहां तक जाएगा?” जवाब मिला: “गाज़ियाबाद तक।” फ़रमाया: “गाज़ियाबाद से आगे क्या होगा?” कहा गया कि: “वह दूसरे गार्ड से कह देगा और वह कानपुर तक पहुंचा देगा, जहां आपका सफ़र ख़त्म हो जाएगा।”

हज़रत फ़रमाने लगे: “नहीं, सफ़र वहां ख़त्म न होगा; बल्कि आगे एक और ‘सफ़रे-आख़िरत’ भी है। वहां का इंतज़ाम क्या होगा?”

यह सुनकर वहां मौजूद सब लोग अंगुश्त-ब-दंदां (दांतों तले उंगली दबाये यानी हैरान) रह गए, जिनमें पढ़े-लिखे हिंदू बाबू भी थे। वे कहने लगे कि इस ज़माने में भी ख़ुदा के ऐसे ईमानदार बंदे मौजूद हैं, जो ख़ुदा से डरकर इतनी एहतियात (सावधानी) करते हैं। (सीरते-अशरफ़, पेज २११)

किराये की अदायगी

इस मामले में भी आप बड़े मुह़्तात़ (चौकने) थे। बिना टिकट और बिना किराया दिए सफ़र हरगिज़ न फ़रमाते, और न किसी दूसरे को ऐसा करने देते।

एक मर्तबा एक तालिबे-इल्म हज़रत की ज़ियारत के लिए थाना भवन आया। हज़रत उस वक़्त सफ़र पर जा रहे थे, इसलिए वह तालिबे-इल्म वक़्त की तंगी की वजह से गार्ड से कहकर बिना टिकट हज़रत के साथ डिब्बे में सवार हो गया। दूसरे स्टेशन ‘नानौता’ पर जब वह गार्ड को किराया देने लगा, तो गार्ड ने कहा: “मामूली किराया है, तुम ग़रीब आदमी हो, जाओ (रहने दो)।”

उस तालिबे-इल्म ने आकर हज़रत को बताया कि यह मुआमला हुआ है। इस पर आपने फ़रमाया: “गार्ड रेलवे कंपनी का नौकर है, रेल का मालिक नहीं है। इसलिए यहां तक का किराया बराबर तुम्हारे ज़िम्मे है। तुम इतने रुपयों का टिकट ख़रीदकर उसे फाड़ दो; ताकि कंपनी का हक़ अदा हो जाए और तुम बंदों के हक़ से बरी हो जाओ।”

उसी डिब्बे में एक अंग्रेज़ी पढ़ा-लिखा आर्य समाजी मुबल्लिग (प्रचारक) भी बैठा था। उसने यह सारी बातचीत सुनकर कहा: “मैं तो पहले खुश हुआ था कि गार्ड ने एक ग़रीब पर तरस खाया है; मगर आपकी तक़रीर (बात) सुनकर अब महसूस कर रहा हूं कि मेरी वह ख़ुशी बेईमानी की थी।” (सीरते-अशरफ़, पेज २११-२१२)

रेलवे वालों का भरोसा

इसी वजह से हज़रत और आपसे जुड़े लोगों पर रेलवे वालों का भरोसा इतना बढ़ गया था कि जब भी वे किसी मोतबर सूरत वाले को थाना भवन की तरफ़ जाते देखते, तो न उसका टिकट चेक करते और न ही सामान तुलवाने के लिए रोकते-टोकते; बल्कि बड़े यक़ीन के साथ कहते कि: “ये थाना भवन मौलाना साहब के पास जा रहे हैं। वहां जाने वाले न कभी बिना टिकट सफ़र करते हैं और न ही सामान तुलवाए बिना गाड़ी में सवार होते हैं।” (सीरते-अशरफ़, पेज २१२)

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