
शैख़ुल हदीष हज़रत मौलाना मुहमंद ज़करिय्या (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः
“दुनिया का कोई काम भी बग़ैर मेहनत, श्रम के नही हो सकता , तिजारत हो, ज़िराअत हो, सब में पापड़ बेलने पड़ते हैं. इसी तरह दीन का काम भी बग़ैर श्रम के नहीं हो सकता, मगर दोनों में फ़र्क़ है, दुनिया तो कभी मिलती है कभी नहीं मिलती, मगर दीन के काम में एसा नही, बलके वहां हर हाल में अजर है. बहोत से लोग दुनियावी तालीम की ड़िगरियां हासिल कर के घूमते फिरते हैं. मगर मुलाज़मत नहीं मिलती यही हाल तिजारत का है, दीन के बारे में मुजाहदा बेकार नहीं जाता.” (मलफ़ूज़ात हज़रत शैख़ (रह.), पेज नं- १२६)
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