सब से ज़्यादह नफ़रत की चीज़ मेरे ज़हन में तकब्बुर है इतनी नफ़रत मुझे किसी गुनाह से नही जितनी इस से है. युं और भी बड़े बड़े गुनाह हैं जैसे ज़िना (व्याभिचार), शराब पीना वग़ैरह, लेकिन...
اور پڑھوदीन की तब्लीग़ में मेहनत
“लोगों को दीन की तरफ़ लाने और दीन के काम में लगाने की तदबीरें सोचा करो (जैसे दुनिया वाले अपने दुनयावी मक़सदों के लिए तदबीरें सोचते रहते हैं) और जिस को जिस तरह से मुतवज्जेह कर सकते हो उस के साथ उसी रास्ते से कोशिश करो.”...
اور پڑھوमाता-पिता की फ़रमांबरदारी रिज़्क़ में कुशादगी का ज़रिआ
“मईशत और रोज़ी में बढ़ोतरी और बरकत का सबब वालीदैन की आज्ञाकारिता तथा फ़रमांबरदारी है, वालिदैन का आज्ञाकारित रोज़गार की तंगी में मुबतला नहीं होता और जो वालिदैन की नाफ़रमानी करने वाला हो वह एक न एक दिन इस परेशानी में मुबतला हो कर रहता है.”...
اور پڑھوदिल को हर समय पाक रखना
“में तो इस का ख़ास प्रबंध रखता हुं के क़ल्ब (हृदय) फ़ुज़ूलियात (व्यर्थ) से मुक्त रहे क्युंकि फ़क़ीर को तो बरतन ख़ाली रखना चाहिए. न मालूम किस वक़्त किसी सख़ी की नज़र इनायत (कृपा) हो जाए. एसे ही...
اور پڑھوसच्ची खुशी और उस की संपन्नता का रहस्य
“जिवन के लुत्फ़(मज़ा) का मदार माल पर नही बलकि तबीअत की प्रसन्नता और रूह पर है और रूहानी प्रसन्नता का मदार दीन और तअल्लुक़ मअल्लाह (अल्लाह तआला के साथ के तअल्लुक़) पर है. पस दीन के साथ दुनिया चाहे कम है मगर लुत्फ़ से भरी हुई होती है और बग़ैर दीन के ख़ुद दुनिया बे लुत्फ़(मज़ा) है.”...
اور پڑھوशादी की मुरव्वजह दअवतें
शेख़ुल हदीष हज़रत मौलाना मुहम्मद ज़करिय्या साहब (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “मुझे इन शादियों की दअवत से हंमेशा नफ़रत रही (चुंके सुन्नत तरीक़ा यह है के शादी में सादगी होनी चाहिए). मेरे यहां देखने वालों को सब ही को मालूम है के मेहमानों की भीड़ बाज़ अवक़ात दो …
اور پڑھوदीन की तब्लीग़ में मेहनत
सय्यिदिना रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) इस्लाम की शुरुआत के ज़माने में (जब दीन कमजोर था और दुनिया मज़बूत थी) बे तलब (जिन में शौक़ नही उन) लोगों के घर जा जा कर उन की सभा में बिला तलब (बिन बुलाये) पहुंच कर दावत देते थे, तलब के प्रतिक्षा नही करते थे. कुछ स्थानों पर...
اور پڑھوमुसीबत की हालत के अहकाम
“अगर मुसीबत हमारे किसी भाई मुसलमान पर नाज़िल हो तो उस को अपने ऊपर नाज़िल समझा जावे उस के लिए वैसी ही तदबीर की जाए जैसा के अगर अपने ऊपर मुसीबत नाज़िल होती तो उस वक़्त ख़ुद करते.”...
اور پڑھوमहबूब आक़ा का फ़रमान
शेख़ुल हदीष हज़रत मौलाना मुहम्मद ज़करिय्या साहब (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “लोग अपने पूर्वजो से, ख़ानदान से और इसी तरह बहोत सी चीज़ों से अपनी शराफ़त तथा बड़ाई ज़ाहिर किया करते हैं, उम्मत के लिए गर्व का ज़रीआ कलामुल्लाह शरीफ़ है के उस के पढ़ने से उस के …
اور پڑھوइस्लाम में फ़र्ज़ और नफ़ल का स्थान
“फ़राईज़ का स्थान नवाफ़िल से बहोत उच्चतर है बलकि समझना चाहिए के नवाफ़िल से मक़सूद ही फ़राईज़ की तकमील या उन की कोताहियों की तलाफ़ी होती है इसलिए के फ़राईज़ असल हैं...
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