मलफ़ूज़ात

राहत पहोंचाना फ़र्ज़ है

हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः   “में ने तो हंमेशा इस का ख़्याल रखा के हुदूदे शरअ से तजावुज़ न हो. इस लिए में ने अपने बुज़र्गो की जुतियां उठाने की ख़िदमत नहीं की. महज़ इस ख़्याल से के वह पसंद न करते थे कहीं …

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सब से ज़्यादह नफ़रत के क़ाबिल चीज़ तकब्बुर है

सब से ज़्यादह नफ़रत की चीज़ मेरे ज़हन में तकब्बुर है इतनी नफ़रत मुझे किसी गुनाह से नही जितनी इस से है. युं और भी बड़े बड़े गुनाह हैं जैसे ज़िना (व्याभिचार), शराब पीना वग़ैरह, लेकिन...

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दीन की तब्लीग़ में मेहनत

“लोगों को दीन की तरफ़ लाने और दीन के काम में लगाने की तदबीरें सोचा करो (जैसे दुनिया वाले अपने दुनयावी मक़सदों के लिए तदबीरें सोचते रहते हैं) और जिस को जिस तरह से मुतवज्जेह कर सकते हो उस के साथ उसी रास्ते से कोशिश करो.”...

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माता-पिता की फ़रमांबरदारी रिज़्क़ में कुशादगी का ज़रिआ

“मईशत और रोज़ी में बढ़ोतरी और बरकत का सबब वालीदैन की आज्ञाकारिता तथा फ़रमांबरदारी है, वालिदैन का आज्ञाकारित रोज़गार की तंगी में मुबतला नहीं होता और जो वालिदैन की नाफ़रमानी करने वाला हो वह एक न एक दिन इस परेशानी में मुबतला हो कर रहता है.”...

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दिल को हर समय पाक रखना

“में तो इस का ख़ास प्रबंध रखता हुं के क़ल्ब (हृदय) फ़ुज़ूलियात (व्यर्थ) से मुक्त रहे क्युंकि फ़क़ीर को तो बरतन ख़ाली रखना चाहिए. न मालूम किस वक़्त किसी सख़ी की नज़र इनायत (कृपा) हो जाए. एसे ही...

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सच्ची खुशी और उस की संपन्नता का रहस्य

“जिवन के लुत्फ़(मज़ा) का मदार माल पर नही बलकि तबीअत की प्रसन्नता और रूह पर है और रूहानी प्रसन्नता का मदार दीन और तअल्लुक़ मअल्लाह (अल्लाह तआला के साथ के तअल्लुक़) पर है. पस दीन के साथ दुनिया चाहे कम है मगर लुत्फ़ से भरी हुई होती है और बग़ैर दीन के ख़ुद दुनिया बे लुत्फ़(मज़ा) है.”...

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शादी की मुरव्वजह दअवतें

शेख़ुल हदीष हज़रत मौलाना मुहम्मद ज़करिय्या साहब (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः  “मुझे इन शादियों की दअवत से हंमेशा नफ़रत रही (चुंके सुन्नत तरीक़ा यह है के शादी में सादगी होनी चाहिए). मेरे यहां देखने वालों को सब ही को मालूम है के मेहमानों की भीड़ बाज़ अवक़ात दो …

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दीन की तब्लीग़ में मेहनत

सय्यिदिना रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) इस्लाम की शुरुआत के ज़माने में (जब दीन कमजोर था और दुनिया मज़बूत थी) बे तलब (जिन में शौक़ नही उन) लोगों के घर जा जा कर उन की सभा में बिला तलब (बिन बुलाये) पहुंच कर दावत देते थे, तलब के प्रतिक्षा नही करते थे. कुछ स्थानों पर...

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मुसीबत की हालत के अहकाम

“अगर मुसीबत हमारे किसी भाई मुसलमान पर नाज़िल हो तो उस को अपने ऊपर नाज़िल समझा जावे उस के लिए वैसी ही तदबीर की जाए जैसा के अगर अपने ऊपर मुसीबत नाज़िल होती तो उस वक़्त ख़ुद करते.”...

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