मौलवी मोहम्मद रशीद की इस बात से मेरा जी बड़ा ख़ुश हुवा, क्युंकि ज़ाहिर करना तो ज़रूरी ही था लेकिन उन्होंने निहायत अदब से ज़ाहिर किया. यह पूछा के क्या यह बैअ (ख़रीदो फ़रोख़्त) में तो दाख़िल नहीं...
اور پڑھوवास्तविक धन
“अल्लाह का नाम लिए जावो मरने के बाद यही काम आवेगा, मेरे प्यारो ! कहना मानो फिर कोई तुम को केहने वाला नही रहेगा, जब मरने वाला मरता है तो यहां वाले तो युं केहते हैं, अहलो अयाल के लिए क्या छोड़ा और वहां वाले पूछते हैं क्या लाया...
اور پڑھوहर अच्छे काम का अंत इस्तिग़फ़ार से करना
लिहाज़ा तबलीग़ का काम भी हंमेशा इस्तिग़फ़ार ही पर ख़तम किया जाए. बंदे से किसी तरह भी अल्लाह तआला के काम का हक़ अदा नहीं हो सकता. तथा एक काम में व्यस्तता बहोत से दूसरे कामों के न हो सकने का भी कारण बन जाती है. तो इस प्रकार की चीज़ों की क्षतीपूर्ती (तलाफ़ी) के लिए भी हर अच्छे काम के ख़तम पर इस्तिग़फ़ार करना चाहिए...
اور پڑھوअल्लाह तआला क्षमा के लिए बहाना चाहता है
हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “एक अहले इल्म रोने लगे के न मालूम मेरा ख़ातमा कैसा होगा. फ़रमाया में भविष्य (मुसतक़बिल) पर क़सम तो खाता नहीं मगर इस को बक़सम केहता हुं के अल्लाह तआला बख़्शने के लिए तो बहाना ढुंढते हैं और अज़ाब …
اور پڑھوजकात देने से पूरी संपत्ति की रक्षा होती है
लेकिन ज़कात न देने से माल रेहता नही, आग लग जाए, मुक़द्दमा में ख़र्च हो जाए, दुख बीमारी में ख़र्च हो जाए, हेतु यह है के किसी न किसी सूरतमें वह माल हाथ से निकल जाता है...
اور پڑھوज़िकरूल्लाह का सहीह मतलब
हक़ीक़ी ज़िकरूल्लाह यह है के आदमी जिस मोक़े पर और जिस हाल, जिस मशगले में हो उस से संबंधित अल्लाह के अहकामो अवामिर (नियम और आदेश) हों उन की निगहदाश्त (ध्यान) रखे और में अपने दोस्तों को उसी “जिकर” की ज़्यादा ताकीद करता हुं...
اور پڑھوअल्लाह तआला से हंमेशा हुस्ने ज़न की ज़रूरत
जब बंदे के ऊपर अल्लाह तआला के हर क़िसम के एहसानात हैं और फिर भी बंदा अल्लाह तआला के साथ अपना गुमान नेक न रखे, बलके यही ख़्याल करता रहे के अल्लाह तआला मुझ से नाराज़ हैं, तो यह कितना बुरा ख़्याल है...
اور پڑھوजीवन के हर पहलू में सुन्नत का पालन करें
इत्तेबाए सुन्नत की जितना हो सके ख़ुद भी कोशिश कीजियो और दोस्तों को भी ताकीद कीजियो...
اور پڑھوतबलीग का सही अर्थ
तबलीग़ यह है के अपनी सलाहिय्यत (योग्यता) और इस्तेअदाद (प्रतिभा) की हदतक लोगों को दीन की बात इस तरह पहोंचाई जाये जिस तरह पहोंचाने से लोगों के मानने की उम्मीद हो. अम्बिया (अलै.) यही तबलीग़ लाये हैं...
اور پڑھوइस्लाम को ज़िन्दा करना
अगर मुसलमान अपनी इस्लाह कर लें और दीन उन में रचबस जाये (स्थापित हो जाये) तो दीन तो वह है ही, लेकिन दुन्यवी मसाईब का भी जो कुछ आजकल उस पर हुजूम है, इनशा अल्लाह चंद रोज़ में काया पलट हो जाये...
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