हज़रत मौलाना मुहमंद इल्यास साहब(रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “हमारे नज़दीक इस वक़्त उम्मत की असल बीमारी दीन की तलब तथा क़दर से उन के दिलों का ख़ाली होना है. अगर दीन की फ़िकर तथा तलब उन के अन्दर पैदा हो जाए और दीन की महत्तवता का शुऊर तथा …
اور پڑھوअस्लाफ़ की तरक़्क़ी और मौजूदा तरक़्क़ी
हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “मौजूदा (दौर की) तरक़्क़ी का हासिल तो हिर्स (लालच) है और शरीअत ने हिर्स (लालच) की जड़ काट दी है. सहाबए किराम (रज़ि.) ने जो हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के नमूना थे कहीं एसे ख़्याल को अपने दिल में …
اور پڑھوहमारे बड़ों के अख़लाक़
“हम ने अपने बड़ों के मुतअल्लिक़ सुना के लोग उन के हालात देख कर और उन की सूरतों को देख कर ही मुसलमान हो जाया करते थे, एक हम हैं के हमारे अख़लाक़ देख कर लोग कहां जाएं.”...
اور پڑھوनमाज़ दीन का स्थंभ है
नमाज़ को हदीष में “इमादुद्दीन” (दीन का स्थंभ) फ़रमाया गया है. उस का यह मतलब है के नमाज़ पर बाक़ी दीन निलंबित है, और वह नमाज़ ही से मिलता है. नमाज़ में दीन का तफ़क्कुह (ज्ञान) भी मिलता है...
اور پڑھوशैतान के प्रलोभनों (वसवसों) को नज़रअंदाज़ करना
एक साहब जो वसाविस में मुब्तला थे सवाल के जवाब में फ़रमाया के शैतान के भगाने की तदबीर यह है के हिम्मत से उस का मुक़ाबला करो और मुक़ाबला यही है के उस की तरफ़ इलतिफ़ात(ध्यान) मत करो...
اور پڑھوमामूलात की पाबंदी
में ने अपने वालिद साहब और हज़रत मदनी दोनों को अख़ीर शब में तन्हाई में रोते और गिड़गिड़ाते हुए देखा यह दोनों बिलकुल एसा रोते थे जैसा मकतब में बच्चा पिट रहा हो...
اور پڑھوख़ुशहाली सुन्नत पर अमल करने में है
पस जिन लोगों को रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के इत्तिबाअ में सादा मुआशरत मरग़ूब हो जाए और उन को इसी में लज़्ज़त और चैन मिलने लगे, उन पर अल्लाह तआला का बड़ा इनाम है के उन का चैन एसी चीज़ों से वाबस्ता फ़रमा दिया जो बेहद ससती है और जिन का हुसूल हर ग़रीबो फ़क़ीर के लिए बहोत आसान है...
اور پڑھوआर्थिक मामलों में सावधानी बरतना
“मालियात में तक़वा बहोत कम देखा जाता है. अफ़आल और आमाल तो आज कल बहोत हैं. तहज्जुद चाश्त इशराक विर्द वजीफ़े तो बहुत मगर यह बात बहुत कम है के माल से मोह तथा मोहब्बत न हो, तथा हो मगर फिर भी सावधान रहें, तो यह उस से बढ़ कर है.”...
اور پڑھوआमदनी के लिहाज़ से ख़र्च करना
जितनी चादर हो उतना ही पांव फैलाना चाहिए, पेहले देख लो के हमारे पास कितना है और किस क़दर गुंजाईश है उसी के अंदर ख़र्च करो, तो फिर इन्शा अल्लाह माली परेशानी न उठानी पड़ेगी...
اور پڑھوमुसलमानों के धार्मिक पतन पर सहानुभूति और चिंता व्यक्त करते हुए
दुनिया के नुक़सान को नुक़सान समझा जाता है लेकिन दीन के नुक़सान को नुक़सान नहीं समझा जाता, फिर हम पर आसमान वाला क्युं रहम करे, जब हमें मुसलमानों की दीनी हालत के अबतर होने पर रहम नहीं...
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