हमारे बुज़ुर्गों का एक मक़ोला(बात) है, “जो हमारी इन्तीहा(अंत) को देखे वह नाकाम और जो इब्तिदा(शुरूआत) को देखे वह कामयाब”, इसलिए के इब्तिदाई जिंदगी (प्रारंभिक जीवन) मुजाहदों(कडा संघर्ष) में गुज़रती है और अख़ीर में फ़ुतुहात(सफ़लताओं) के दरवाज़े खुलते हैं...
اور پڑھوहक़ीक़ी इमान की अलामत
"इमान यह है के अल्लाह व रसूल(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) को जिस चीज़ से ख़ुशी और राहत हो बंदे को भी उस से ख़ुशी और राहत हो. और जिस चीज़ से अल्लाह व रसूल(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) को...
اور پڑھوइमान की हिफ़ाज़त बुज़ुर्गोने दीन की संगात पर निर्भर है
हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः
"यह ज़माना बहोत ज़्यादह फ़ितनों से भरा हुवा है. इस में तो इमान ही के लाले पड़े हैं. इसी वजह से में ने बुज़ुर्गाने दीन की सोहबत(संगात) को फ़र्ज़े ऐन(बहुत ज़रूरी) क़रार दिया है(घोषित किया है). में तो फ़तवा देता हुं के...
اور پڑھوतकलीफ़ का कारण न बनना
इस ज़माने में दुरूद शरीफ़ और इस्तिग़फ़ार की कषरत रखी जावे और उस की कोशिश की जावे के किसी रफ़ीक़(साथी) को मेरी तरफ़ से तकलीफ़ न पहुंचे और अगर किसी की तरफ़ से हक़ तलफ़ी(किसी को उन के अधिकारो से वंचित करना) और तअद्दी(अन्याय) हो तो उस पर इल्तिफ़ात(ध्यान) न किया जावे...
اور پڑھوहर शख़्स को अपनी इस़लाह़ की फ़िकर की ज़रूरत है
हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी(रह.) ने एक मर्तबा फ़रमायाः आजकल यह मर्ज़(रोग) भी आम(सामान्य) हो गया है के अकषर लोग दूसरों के पीछे पड़े हुए हैं अपनी मुत़लक़ फ़िकर नहीं...
اور پڑھوदाढ़ी मुंड़वाने का नुक़सान
हज़रत शैख़ मौलाना मुहमंद ज़करिय्या (रह.) ने एक मर्तबा फ़रमायाः आज लोग दाढ़ी मुंड़वाने को गुनाह नहीं समझते, एक दफ़ा हुज़ूरे अकरम (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के पास दो काफ़िर क़ासिद (संदेशा पहोंचाने वाला) आए वोह दाढ़ी मुंड़े थे, हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने मुंह फैर लिया...
اور پڑھوइख़लास – तमाम दीनी कामों की क़बूलियत की बुन्याद
हज़रत मौलाना मुहमंद इल्यास साहब(रह.) ने एक मर्तबा फ़रमाया के...
اور پڑھوघर में दीनी माहौल पैदा करना
हज़रत शैख़ मौलाना मुहमंद ज़करिया(रह.) ने एक मर्तबा फ़रमाया...
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