मय्यित को क़िब्ले की तरफ से लाया जाए और क़बर में इस तरह उतारा जाए के मय्यित को उतारने वाले क़बर में क़िबले की तरफ़ रूख़ कर के खड़े हों. रसूले करीम (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) सहाबए किराम (रज़ि.) को इसी तरह दफ़ण फ़रमाते थे....
और पढ़ो »मोहब्बत का बग़ीचा (छठा प्रकरण)
यह बात मशहूर और प्रसिद्ध है के इन्सान के अख़लाक़ो आदात और उस के कार्य, उस की दिल की कैफ़ियात की तरजुमानी करते हैं. अगर किसी का दिल अल्लाह तआला और उस के रसूल (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) की महब्बत से लबरेज़ हो...
और पढ़ो »मुहब्बत का बग़ीचा (पांचवा प्रकरण)
“दीने इस्लाम” इन्सान पर अल्लाह तबारक व तआला की तमाम नेअमतों में से सब से बड़ी नेअमत है. दीने इस्लाम की मिषाल उस हरे हरे भेर बाग़ की सी है, जिस में प्रकार प्रकार के फलदार झाड़, खुश्बूदार फूल और उपयोगी पौदे होते हैं. जब इन्सान...
और पढ़ो »तदफ़ीन से संबंधित मसाईल
(४) औरत के लिए जनाज़े के साथ क़बरस्तान जाना और तदफ़ीन में शिरकत करना ना जाईज़ है...
और पढ़ो »जनाज़े को क़ब्रस्तान तक ले जाने से संबंधित मसाईल
(१) अगर मय्यित शिशु (दुध पिता बच्चा) हो तथा उस से बड़ा हो, तो उस को क़बरस्तान ले जाने में नअश(मृत देह) (चारपाई) पर उठाया नही जाएगा, बलकि उस को हाथ पर उठा कर ले जाया जाएगा...
और पढ़ो »मुहब्बत का बग़ीचा (चोथा प्रकरण)
रसूले करीम (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के मुबारक दौर में जब लोग इस्लाम में दाख़िल होने लगे और भिन्न भिन्न विस्तारों में इस्लाम की इशाअत (फ़ैलने) की ख़बर पहोंचने लगी, तो बनु तमीम के सरदार अकषम बिन सैफ़ी (रह.) के दिल में इस्लाम के बारे में जानने का शौक़ पैदा हुवा...
और पढ़ो »जनाज़ा उठाने का तरीक़ा
(२) जनाज़ा को तेज़ी से ले कर चलना मसनून है, लेकिन दोड़ना नहीं चाहिए और न ही इतना ज़्यादह तेज़ चलना चाहिए के मय्यित का जिस्म एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हिलने लगे...
और पढ़ो »मुहब्बत का बग़ीचा (तीसरा प्रकरण)
नबीए करीम (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने अपनी वफ़ात से पेहले हज़रत फ़ातिमा (रज़ि.) को ख़ुश ख़बरी दी थी के “तुम जन्नत की सारी औरतों की मलिका (रानी) बनोगी”...
और पढ़ो »जनाज़े की नमाज़ में ताख़ीर (देरी)
बड़ी जमाअत की उम्मीद में जनाज़े की नमाज़ में देर करना मकरूह है. इसी तरह अगर किसी का जुम्आ के दिन इन्तिक़ाल हो जाए, तो यह उम्मीद कर के जुम्आ की नमाज़ के बाद ज़्यादह लोग जनाज़े की नमाज़ में शिर्कत करेंगे, जनाज़े की नमाज़ में देर करना मकरूह है...
और पढ़ो »मुहब्बत का बग़ीचा (दूसरा प्रकरण)
यक़ीनन करूणता व मुहब्बत का यह निराला जौहर हमारे आक़ा सरकारे दो आलम (सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के तमाम अख़लाक़े आलिया(उच्च संस्कार) और अवसाफ़े हमीदा(नीराली सभ्यता) के अंदर थे और आप के यही मुबारक किरदार(व्यव्हार) को मखलूक़े इलाही दीन-रात मुशाहदा करते(देखते) थे. जो बहोस से लोगों के इस्लाम लाने का कारण बना.۔۔
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