मस्जिद में बाजमाअत नमाज़ अदा करने की सुन्नत का प्रबंध मुहद्दिषे जलील, फ़क़ीहुल असर हज़रत मौलाना ख़लील अहमद (रह.) अपने ज़माने के बहोत बड़े वली थे. वह तबलीग़ के बानी हज़रत मौलाना मोहम्मद इल्यास कांधलवी (रह.) और मुहद्दिषे जलील हज़रत मौलाना शैख़ुल हदीष मोहम्मद ज़करिय्या कांधलवी (रह.) के शैख़ थे …
اور پڑھوगुलामों को आज़ाद करने से अफ़ज़ल
عن أبي بكر رضي الله عنه قال: الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم أمحق للخطايا من الماء للنار والسلام…
हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अ़लैहि व-सल्लम से हज़रत अ़ब्दुल्लाह बिन-मसऊ़द रज़ियल्लाहु अ़न्हु की मुशाबहत
سئل سيدنا حذيفة رضي الله عنه عن أقرب الناس سمتا برسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ” كان أشب…
ताज़ियत की सुन्नतें और आदाब – २
(१) ताज़ियत का मतलब यह है कि मय्यित के रिश्तेदारो और अज़ीज़ों को उन की मुसीबत पर तसल्ली दी जाए और उन…
हज़रत रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु ‘अलैहि व-सल्लम की लानत
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: رغم أنف رجل ذكرت عنده فلم يصل علي، …
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम को फ़रिश्तों के ज़रिए दुरूद शरीफ़ के बारे में ख़बर पड़ना
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من صلى علي عند قبري سمعته ومن صلى عل…
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मोहब्बत का बग़ीचा (पच्चीसवां प्रकरण)
بسم الله الرحمن الرحيم इस्लाम में ख़ैर ख़्वाही की महत्तवता इस्लाम की तमाम तालीमात (शिक्षाए) में से हर तालीम इन्तिहाई दिल आवेज़ और ख़ूबसूरती को ज़ाहिर करती है. बड़ों का अदब तथा एहतेराम करना, छोटों पर शफ़क़त तथा मेहरबानी करना और वालिदैन और अज़ीज़ो अक़ारिब के अधिकार को पूरा करना …
اور پڑھوसहाबए किराम (रज़ि.) के लिए मोहब्बत
हज़रत जाफ़रूस साईग़(रह.) बयान करते हैं के हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल(रह.) के पड़ोस में एक आदमी रेहता था. जो बहुत से गुनाहों और बुराईयों में शामिल था. एक दिन वह आदमी हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल(रह.) की सभा में हाज़िर हुवा और सलाम किया. हज़रत इमाम अहमद बिन हम्बल(रह.)ने …
اور پڑھوदुरूदे-इब्राहीम
عن كعب بن عجرة، قال: لما نزلت: إن الله وملائكته يصلون على النبي الآية، قلنا: يا رسول الله، قد علمنا السلام عليك، فكيف الصلاة؟ قال: ” قولوا: اللهم صل على محمد وعلى آل محمد كما صليت على إبراهيم وعلى آل إبراهيم إنك حميد مجيد وبارك على محمد وعلى آل محمد، …
اور پڑھوइख़्लास के साथ मुजाहदा करना
हज़रत मौलाना मुहमंद इल्यास साहब(रह.) ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमायाः “अगर कोई शख़्स अपने को तबलीग़ का अहल नहीं समझता तो उस को बेठा रेहना हरगिज़ नहीं चाहिए, बलके उस को तो काम में लगने और दूसरों को उठाने की और ज़्यादा कोशिश करना चाहिए, बाज़ दफ़ा एसा होता है …
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