
(१) रमज़ान से पेहले ही रमज़ान की तैयारी शुरू कर दें. बाज़ बुज़ुर्गा-ने-दीन रमज़ान की तैयारी रमज़ान से छ महीने पेहले शुरू फ़रमा देते थे.
(२) जब रजब का महीना शुरू हो जाए, तो निम्नलिखित दुआ मांगेः
اَللّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْ رَجَبٍ وَّشَعْبَان وَبَلِّغْنَا رَمَضَان
ऐ अल्लाह! हमारे लिए रजब और शाबान के महीने में बरकत अता फ़रमा और हमें रमज़ान के महीने तक पहुंचा।
عن أنس رضي الله عنه أنه قال: كان النبي صلى الله عليه و سلم إذا دخل رجب قال: اَللّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْ رَجَبٍ وَّشَعْبَانَ وَبَلِّغْنَا رَمَضَان (شعب الايمان، الرقم: ۳۸۱۵)
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि जब रजब शुरू होता था, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम यह दुआ पढते थे:
اَللّهُمَّ بَارِكْ لَنَا فِيْ رَجَبٍ وَّشَعْبَان وَبَلِّغْنَا رَمَضَان
(३) रमज़ान की बरकतों और रहमतों से पूरे तौर पर फायदा उठाने के लिए आदमी को निज़ामुल अवक़ात (यानी टाईम टेबल) बनाना चाहिए.
عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه و سلم أنه قال: من صام رمضان وعرف حدوده وتحفظ مما ينبغي له أن يتحفظ كفر ما قبله (رواه ابن حبان في صحيحه والبيهقي كما في الترغيب و الترهيب، الرقم: ۱٤۷٤)
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रदि अल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु ‘अलैहि व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स रमज़ानुल मुबारक का रोज़ा रखे और उस के हुदूद को पहचाने (रमज़ानुल मुबारक के हुदूद, अहकाम और आदाब की रिआयत करे) और जिन जिन चीज़ों से बचना चाहिए, उन सब से वह बचे, तो उस के तमाम पिछले (सगीरा)(छोटे) गुनाह मिटा दिए जाऐंगे.
(४) अगर किसी के ज़िम्मे हुक़ूक़ुल्लाह या हुक़ूक़ुलइबाद की अदाईगी बाक़ी हो (हुक़ूक़ुल्लाह जैसे क़ज़ा नमाज़ें, क़ज़ा रोज़े और सदक़ाते वाजिबा वग़ैरह और हुक़ूक़ुलइबाद जैसे किसी पर ज़ुल्म किया हो या किसी को तकलीफ़ पहोंचाई हो या किसी के क़र्ज़ या दैन उस के ज़िम्मे हो), तो माहे रमज़ान की आमद से पेहले इन तमाम मामलात को पूरा कर लें और हर ऐक का हक़ अदा कर लें.
किसी पर ज़ुल्म किया हो या किसी को तकलीफ़ पहोंचाई हो, तो उन से माफ़ी तलब करें, ताके आप रमज़ानुल मुबारक की बरकतें पूरे तौर पर हासिल कर सकें.
(५) रमज़ान से पेहले अपनी नफ़ल इबादत में इज़ाफ़ा करें और इबादत का मामूल बनाऐं, ताकि रमज़ानुल मुबारक में आप ज़्यादह से ज़्यादह इबादत कर सकें.
(६) रमज़ानुल मुबारक से पेहले ख़ूब इस्तिगफ़ार करें और दुआऐं भी करें.
(७) रमज़ानुल मुबारक से पेहले तमाम मसरूफ़ियात और ज़रूरियात से फ़ारिग़ होने की कोशिश करें, ताकी रमज़ानुल मुबारक में ज़्यादह से ज़्यादह इबादत कर सकें.
عن عبادة بن الصامت رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه و سلم قال يوما وحضر رمضان أتاكم رمضان شهر بركة يغشاكم الله فيه فينزل الرحمة ويحط الخطايا ويستجيب فيه الدعاء ينظر الله تعالى إلى تنافسكم فيه ويباهي بكم ملائكته فأروا الله من أنفسكم خيرا فإن الشقي من حرم فيه رحمة الله عز و جل رواه الطبراني ورواته ثقات إلا أن محمد بن قيس لا يحضرني فيه جرح ولا تعديل (الترغيب و الترهيب رقم ۱٤۹٠)
हज़रत उबादह बिन सामित(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने ऐक दिन इरशाद फ़रमाया के रमज़ान आ चुका है जो ख़ैरो बरकत का महीना है. इस महीने में अल्लाह तआला तुम्हें(अपनी रहमत ओर बरकत से) धांप लेते हैं. रहमत नाज़िल फ़रमाते हैं, गुनाहों को माफ़ फ़रमाते हैं और दुआ क़बूल फ़रमाते हैं. अल्लाह तआला इस महीने में नेक कामों में तुम्हारी मुसाबक़त को देखते हैं और अपने फ़रिश्तों के सामने तुम्हारे ऊपर ख़ूशी का इज़हार फ़रमाते हैं, लिहाज़ा अल्लाह तआला को अपने अच्छे और नेक काम दिखावो, बेशक बदनसीब वह है जो इस में(रमज़ान के महीने में) अल्लाह तआला की रहमत से महरूम हो गया.
(८) रमज़ान शुरू होने के बाद और रमज़ान के दौरान निम्नलिखित दुआ मांगेः
اَللّهُمَّ سَلِّمْنِيْ لِرَمَضَان وَسَلِّمْ رَمَضَانَ لِيْ وَسَلِّمْهُ لِيْ مُتَقَبَّلًا
इलाही रमज़ान के महीने के लिए मुझे सलामत रखिए और रमज़ान के महीने को मेरे लिए सलामत रखिए और उस को मेरी तरफ़ से क़बूल फ़रमाईए.
عن عبادة بن الصامت رضي الله عنه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعلمنا هؤلاء الكلمات إذا جاء رمضان اللهم سلمني لرمضان وسلم رمضان لي وسلمه لي متقبلا (كنز العمال، الرقم: ۲٤۲۷۷، وقال: رواه الطبرناني في الدعاء والديلمي وسنده حسن)
हज़रत उबादह बिन सामित रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि जब रमज़ान का महीना आता, तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम हमें यह कलिमात सीखाते थे:
اَللّهُمَّ سَلِّمْنِيْ لِرَمَضَان وَسَلِّمْ رَمَضَانَ لِيْ وَسَلِّمْهُ لِيْ مُتَقَبَّلًا
(९) रमज़ान के महीने में नेक आमाल करने और बुरे आमाल से बचने की आदत ड़ालिए.
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه و سلم إذا كان أول ليلة من شهر رمضان صفدت الشياطين ومردة الجن وغلقت أبواب النار فلم يفتح منها باب وفتحت أبواب الجنة فلم يغلق منها باب وينادي مناد يا باغي الخير أقبل ويا باغي الشر أقصر ولله عتقاء من النار وذلك كل ليلة (ترمذي رقم ٦۸۲)
हज़रत अबु हुरैरह(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के जब रमज़ान की पेहली शब होती है, तो शयातीन और सरकश जिन्नात जकड़ दिए जाते हैं और जहन्नम के सारे दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं. उन में से कोई दरवाज़ा भी खुला नहीं रेहता. और जन्नत के सारे दरवाज़े खोल दिए जाते हैं. उन में से कोई दरवाज़ा बंद नहीं किया जाता. और अल्लाह तआला की तरफ़ से आवाज़ लगाने वाला फ़रिश्ता आवाज़ लगाता है के ऐ नेकी के तालिब ! आगे बढ़. और ऐ बुराई के ख़्वाहिश मंद ! रूक जा. और अल्लाह तआला की तरफ़ से बोहत से बंदो को दोज़ख़ से आज़द किया जाता है. और यह सब रमज़ानुल मुबारक की हर शब में होता है.
(१०) अगर आप किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराने की ताकत रखते हैं, तो ज़रूर करें, ख़्वाह उसे इफ़्तार के लिए एक खजूर भी दें।
عن زيد بن خالد الجهني قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم من فطر صائما كان له مثل أجره غير أنه لا ينقص من أجر الصائم شيئا (سنن الترمذي، الرقم: 807، وقال: هذا حديث حسن صحيح)
हज़रत ज़ैद बिन-खालिद अल-जुहनी रज़ियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने फ़रमाया: जो शख़्स किसी रोज़ेदार को इफ़्तार कराए, तो उसे वही सवाब मिलेगा, जो रोज़ेदार को मिलता है, बग़ैर इसके कि रोज़ेदार के सवाब में कोई कमी वाक़े हो।
(११) बुज़ुर्गाने दीन की सोहबत(संगात) में समय गुज़ारिए, ताकि आप रमज़ानुल मुबारक की बरकात से ज़्यादह से ज़्यादह फ़ाइदा हासिल कर सकें.
(१२) हराम और मुश्तबह (शक वाली) चीज़ों से ऐहतिराज़ करें (बचे), ख़्वाह वह मुश्तबह (शक वाली) या हराम चीज़ें खाने पीने से मुतअल्लिक़ हो या अमल से मुतअल्लिक़ हो।
(१३) रोज़ा ऐक महान इबादत है, लिहाज़ा रोज़े की हालत में हर उस अमल से ऐहतिराज़ ज़रूरी है, जिस से रोज़े का सवाब बर्बाद हो जाए; चुनांचे रोज़ेदार के लिए ज़रूरी है कि वह हर क़िसम के लायानी (बेकार) काम और फ़ुज़ूल बात (काम बगैर की बात) से पूरे तौर पर बचें।
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: رب صائم ليس له من صيامه إلا الجوع ورب قائم ليس له من قيامه إلا السهر (سنن ابن ماجة، الرقم: ۱٦۹٠)
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि बहोत से रोज़ेदार ऐसे हैं कि उन को रोज़े से भूक के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होता है और बहुत से रात के नमाज़ पढ़ने वाले (रात के इबादत गुज़ार) ऐसे हैं कि उन को रात की इबादत से जागने के सिवा कुछ भी नहीं मिलता है.
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من لم يدع قول الزور والعمل به فليس لله حاجة في أن يدع طعامه وشرابه (صحیح البخاري، الرقم: ۱۹٠۳)
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जो शख़्स (रोज़े की हालत में) झुठ बोलना और उस पर अमल करना न छोड़े, तो अल्लाह तआला को इस बात की कोई ज़रूरत नहीं कि वह खाना पीना छोड़ दे।
(१४) रोज़े की हालत में गाली गलोच, झगड़ा और बेहूदा बातचीत से परहेज़ करना ज़रूरी है।
अगर कोई आदमी रोज़ेदार से झगड़ा करना चाहे, तो रोज़ेदार को चाहिए कि वह उस को अच्छे अंदाज़ में कह दे कि मैं रोज़ेदार हूं (यानी रोज़ेदार के लिए झगड़ा करना बिलकुल मुनासिब नहीं है).
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: وإذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصخب فإن سابه أحد أو قاتله فليقل إني امرؤ صائم (صحیح البخاري، الرقم: ۱۹٠٤)
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि जब तुम में से कोई रोज़े से हो, तो वह फ़ुहश बातें (गंदी बातें) न करे और न शोर मचाए (यानी जाहिलाना तरीक़े पर शोर मचाते हुए बात न करे.) अगर कोई उस से गाली गलोच करे या उस से झगड़ा करे तो वह उस से कह दे, मैं रोज़ेदार हूं।
(फ़ुहश बातें= बेशर्मी की बातें, बदकारी की बातें, गंदी बातें)
(१५) रमज़ान के महीने में नफ़ल का सवाब फ़र्ज़ के बराबर हो जाता है और फ़र्ज़ का सवाब सत्तर गुना बढ़ जाता है, लिहाज़ा रमज़ान के महीने में ज़्यादा से ज़्यादा नवाफ़िल का ऐहतिमाम करें और फ़राईज़ से बिलकुल ग़फ़लत न बरतें।
عن سلمان رضي الله عنه قال: خطبنا رسول الله صلى الله عليه و سلم في آخر يوم من شعبان … من تقرب فيه بخصلة من الخير كان كمن أدى فريضة فيما سواه ومن أدى فريضة فيه كان كمن أدى سبعين فريضة فيما سواه (الترغيب و الترهيب، الرقم: ۱٤۸۳)
हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने शाबान के आख़री दिन हमारे सामने ख़ुत्बा दिया। (आप सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इस ख़ुत्बे में इरशाद फ़रमाया कि) जो शख़्स इस माह में कोई अच्छा काम (नफ़ल) करके अल्लाह तआला का क़ुर्ब (नज़दीकी) हासिल करे, तो उस को रमज़ान के महीने के अलावह में फ़र्ज़ अदा करने वाले के बराबर सवाब मिलेगा और जो इस माह में एक फ़र्ज़ अदा करे, तो उस को उस शख़्स के बराबर सवाब मिलेगा, जिस ने दीगर महीनों में सत्तर फ़राईज़ अदा किये.
(१६) रमज़ानुल मुबारक की हर शब बीस रकात तरावीह की नमाज़ अदा कीजिए. तरावीह की नमाज़ सुन्नते मुअक्कदह है. हज़रत उमर(रज़ि.) के दौर में तमाम सहाबए किराम(रज़ि.) ने बीस रकात तरावीह की नमाज़ पर इत्तेफ़ाक़(संतोष) किया था. तरावीह की नमाज़ में कम अज़ कम एक क़ुर्आन करीम मुकम्मल करने की कोशीश कीजिए.
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : من قام رمضان إيمانا واحتسابا غفر له ما تقدم من ذنبه (ابو داود رقم ۱۳۷۳)
हज़रत अबू हुरैरह(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के जो आदमी इमान और षवाब की उम्मीद के साथ रमज़ान की रातों में तरावीह की नमाज़ पढ़े. उस के पिछले(सारे छोटे)गुनाह माफ़ कर दिए जाऐंगे. (अबू दावुद)
عن عبد الرحمن بن عوف رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم إن الله تبارك و تعالى فرض صيام رمضان عليكم و سننت لكم قيامه فمن صامه و قامه إيمانا و احتسابا خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمه (سنن النسائي ۱/۳٠۸)
हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़(रज़ि.) से मरवी है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के बेशक अल्लाह तआला ने तुम्हारे ऊपर रमज़ान का रोज़ा फ़र्ज़ किया है और में ने तुम्हारे लिए उस की रातों में तरावीह पढ़ना सुन्नत किया है, लिहाज़ा जो शख़्स रमज़ान के महीने में इमान और षवाब की उम्मीद के साथ रोज़ा रखे और तरावीह की नमाज़ पढ़े, तो वह (अपने सारे छोटे) गुनाहों से पाक व साफ़ हो जाएगा उस दिन की तरह जिस दिन उस की मां ने उस को जना था(जिस दिन वह पैदा हुवा था).
عن ابى الحسناء أن علي بن أبي طالب أمر رجلا أن يصلي بالناس خمس ترويحات عشرين ركعة – باب ما روي في عدد ركعات القيام في شهر رمضان (سنن الكبرى للبيهقي رقم ٤۸٠۵)
हज़रत अबुल हसना(रह.) से मरवी है के हज़रत अली बिन अबी तालिब(रज़ि.) ने ऐक आदमी को हुक्म दिया के वह लोगों के साथ बीस रकात तरावीह की नमाज़ पढ़ाऐं.
عن الأعمش عن زيد بن وهب قال كان عبد الله بن مسعود يصلي لنا في شهر رمضان فينصرف عليه ليل قال الأعمش كان يصلي عشرين ركعة و يوتر بثلاث (عمدة القاري ۱۱/۱۲۷)
हज़रत अअमश(रह.) फ़रमाते हैं के रमज़ान के महीने में हज़ऱत अब्दुल्लाह बिन मसऊद(रज़ि.) हमारे साथ बीस रकात(तरावीह) पढ़ाते थे और तीन रकातें वित्र पढ़ाते थे.
روى البيهقي بإسناد صحيح انهم كانوا يقيمون على عهد عمر بعشرين ركعة و علي عهد عثمان و علي (و هكذا هو في عمدة القاري) (فتح الملهم ۲/۳۲٠)
इमाम बयहक़ी(रह.) ने सहीह सनद से नक़ल किया है के सहाबए किराम(रज़ि.) हज़ऱत उमर, हज़रत उषमान और हज़रत अली(रज़ि.) के दौर में बीस रकातें(तरावीह की नमाज़) पाबंदी से पढ़ते थे.
(१७) निम्नलिखित चार आमाल कसरत के साथ करेः
(अ) कलिमह तय्यिबा का ज़िक्र करना (यानी لا الٰە الا الله का ज़िक्र करना)।
(ब) इस्तग़फ़ार करना।
(ज) जन्नत का सवाल करना।
(द) जहन्नम से पनाह मांगना।
عن سلمان رضي الله عنه قال: خطبنا رسول الله صلى الله عليه و سلم في آخر يوم من شعبان … واستكثروا فيه من أربع خصال خصلتين ترضون بهما ربكم وخصلتين لا غناء بكم عنهما فأما الخصلتان اللتان ترضون بهما ربكم فشهادة أن لا إله إلا الله وتستغفرونه وأما الخصلتان اللتان لا غناء بكم عنهما فتسألون الله الجنة وتعوذون به من النار (الترغيب و الترهيب الرقم: ۱٤۸۳)
हज़रत सलमान फ़ारसी रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने शाबान के आख़री दिन हमारे सामने तक़रीर की। (आप सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इस तक़रीर में फ़रमाया कि) इस महिने में (रमज़ान के महीने में) चार अमल कसरत से करो. (इन चार अमल में से) दो अमल ऐसे हैं कि तुम उन के ज़रिए अपने रब की ख़ुशनूदी हासिल करोगे और दुसरे दो अमल ऐसे हैं के उन के बग़ैर तुम्हारे लिए कोई चारा नहीं है. रब को ख़ुश करने वाले अमल: कलिमा لا الٰە الا الله और इस्तग़फ़ार है और दो ज़रूरी अमल (जिन के बग़ैर कोई चारा नहीं है) अल्लाह तआला से जन्नत का सवाल करना और जहन्नम से पनाह मांगना है।
(१८) रमज़ान के महीने में ख़ूब दआ करें. रोज़ेदार की दुआ ज़रूर क़बूल की जाती है, ख़ास तौर पर इफ़तार से पेहले जो दुआ मांगी जाती है, वह कबूल होती है।
عن أبي هريرة رضی الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ثلاثة لا ترد دعوتهم الصائم حتى يفطر والإمام العادل ودعوة المظلوم يرفعها الله فوق الغمام ويفتح لها أبواب السماء ويقول الرب: وعزتي لأنصرنك ولو بعد حين (سنن الترمذي، الرقم: ۳۵۹۸)
हज़रत अबू हुरैरह रज़ियल्लाहु ‘अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम का इरशाद है कि तीन लोगों की दुआ रद नहीं की जाती हैः (१) रोज़ेदार की दुआ, यहांतक कि वह इफ़तार कर ले, (२) आदिल बादशाह की दुआ, (३) मज़लूम की दूआ (बद दुआ) अल्लाह तआला उस को बादलों के ऊपर उठा लेते हैं और उस के लिए आसमान के दरवाज़े खोल देते हैं और अल्लाह तआला फ़रमाते हैं कि मेरी इज़्ज़त की क़सम! मैं ज़रूर-बिज़्ज़रूर तुम्हारी मदद करूंगा, अगर-चे कुछ मुद्दत के बाद ही क्यूं न हो।
عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: للصائم عند إفطاره دعوة مستجابة وكان عبد الله بن عمرو إذا أفطر دعا أهله وولده ودعا (شعب الايمان، الرقم: ۳٦۲٤)
हज़रत अम्र रज़ियल्लाहु ‘अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम को यह फ़रमाते हुए सुना कि इफ़तार के समय रोज़ेदार की दुआ क़बूल की जाती है. (रावी फ़रमाते हैं कि) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ियल्लाहु ‘अन्हु की आदते-मुबारका यह थी कि जब इफ़तार का वक़्त होता, तो वह अपने घरवालों और बच्चों को बुलाते थे और (उन सब के साथ) दुआ करते थे।
(१९) रमज़ान के महीने को शहरूल-क़ुर्आन (क़ुर्आन का महीना) कहा जाता है, लिहाज़ा इस महीने में जितना ज़्यादा हो सके, क़ुर्आने-पाक की तिलावत करना चाहिए. हाफ़ीज़ को ग़ैर हाफ़िज़ से ज़्यादा क़ुर्आने-पाक पढ़ना चाहिए।
(२०) रमज़ान के महीने में ख़ूब सख़ावत किजीए. रमज़ान के महीने में नबी(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) की सख़ावत ख़ूब बढ़ जाती थी.
عن ابن عباس قال كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أجود الناس وكان أجود ما يكون في رمضان حين يلقاه جبريل وكان يلقاه في كل ليلة من رمضان فيدارسه القرآن فلرسول الله صلى الله عليه وسلم أجود بالخير من الريح المرسلة (بخاري رقم ٦)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास(रज़ि.) फ़रमाते हैं के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) तमाम लोगों में से सब से ज़्यादह सख़ी थे. और दीगर समयों में आप(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) इस मुबारक महीने में सब से ज़्यादह सख़ी थे, जब हज़रत जिब्रईल(अलै.) आप(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) से मिला करते थे और हज़रत जिब्रईल(अलै.) आप से रमज़ान की हर रात में मिला करते थे और आप के साथ क़ुर्आन का दौर करते थे. (ग़र्ज यह के) रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)इस मुबारक महीने में सख़ावत व फ़य्याज़ी में रहमत की तेज़ हवा से भलाई और ख़ैर में बढ़े हुए थे.
(२१) सेहरी खाने में बेपनाह बरकतें हैं, लिहाज़ा रोज़ा शुरू करने से पेहले सेहरी के लिए ज़रूर जागिए.
عن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه و سلم السحور كله بركة فلا تدعوه ولو أن يجرع أحدكم جرعة من ماء فإن الله عز و جل وملائكته يصلون على المتسحرين رواه أحمد وإسناده قوي (الترغيب و الترهيب رقم ۱٦۲۳)
हज़रत अबू सईद ख़ुदरी(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)ने इरशाद फ़रमाया के सेहरी खाने में बरकत है. इसलिए उसे हरगिज़ न छोड़ीए, अगरचे पानी का एक धोंट क्युं न हो, क्युंकि अल्लाह तआला सेहरी करने वालों पर अपनी खास रहमत नाज़िल फ़रमाते हैं और फ़रिश्ते उन के लिए ख़ैर की दुआ करते हैं.
وعن عمرو بن العاص رضي الله عنه قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فصل ما بين صيامنا وصيام أهل الكتاب أكلة السحر. (مسلم رقم ۱٠۹٦)
हज़रत अम्र बिन आस(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)ने इरशाद फ़रमाया, “हमारे और ऐहले किताब(यहूद और नसारा) के रोज़ों के दरमियान फ़र्क करनेवाली चीज़ सेहरी का खाना है.
(२२) रात के आख़री हिस्से में सेहरी करना मुस्तहब है(यअनी सुबह सादिक़ से कुछ समय पेहले).
عن أنس بن مالك رضي الله عنه أن نبي الله صلى الله عليه وسلم وزيد بن ثابت تسحرا فلما فرغا من سحورهما قام نبي الله صلى الله عليه وسلم إلى الصلاة فصلى قلنا لأنس كم كان بين فراغهما من سحورهما ودخولهما في الصلاة قال قدر ما يقرأ الرجل خمسين آية (بخاري رقم ۵۷٦)
हज़रत अनस बिन मालिक(रज़ि.) से रिवायत है के अल्लाह के नबी(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) और ज़ैद बिन षाबित(रज़ि.) ने सेहरी खाई और जब दोनों सेहरी से फ़ारिग़ हो गए, तो अल्लाह के नबी(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) फ़जर की नमाज़ के लिए खड़े हो गए. हम ने पूछा(यअनी हज़रत अनस(रज़ि.) के शागिर्दोंने उन से पूछा के) सेहरी खाने और फ़जर के दरमियान कितना वक़फ़ा था? उन्होंने जवाब दियाः पचास आयतों की तिलावत के बक़दर.
(२३) रमज़ानुल-मुबारक तहज्जुद की नमाज़ पढ़ने का बेहतरीन मोक़ा है, इस लिए के सेहरी के लिए जागना ही है।
(२४) ग़ुरूबे आफ़ताब के बाद इफ़तार जल्दी करे.
عن سهل رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: لا يزال الناس بخير ما عجلوا الفطر. قال أبو عيسى حديث سهل بن سعد حديث حسن صحيح (ترمذي رقم ٦۹۹)
हज़रत सहल बिन सअद(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के जब तक लोग इफ़तार में जल्दी करें वह हंमेशा भलाई में रहेंगे.
عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم قال الله تعالى أحب عبادي إلي أعجلهم فطرا. (ترمذي رقم ۷٠٠)
हज़रत अबू हुरैरह(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने फ़रमाया के अल्लाह तआला का फ़रमान है के “मेरे बंदो में से मुझे वह बंदे सब से ज़्यादह महबूब है जो इफ़तार में जल्दी करें.”
(२५) खजूर और पानी से इफ़तार करना बेहतर है.
عن سلمان بن عامر قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر أحدكم فليفطر على تمر فإنه بركة فإن لم يجد تمرا فالماء فإنه طهور (ترمذي رقم ٦۵۸)
हज़रत सलमान बिन आमिर(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के जब तुम में से कोई रोज़े से हो, तो वह खजूर से इफ़तार करे, क्युंकि उस में बरकत है. और अगर खजूर न मिले, तो पानी से इफ़तार करे, क्युंकि यह एक पाकीज़ा चीज़ है.
عن أنس قال : كان النبي صلى الله عليه وسلم يفطر قبل أن يصلي على رطبات فإن لم تكن فتميرات فإن لم تكن تميرات حسى حسوات من ماء . (ترمذي رقم ٦۹٦)
हज़रत अनस(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने मग़रिब की नमाज़ से पेहले चंद तर खजूरों से इफ़तार फ़रमाते थे. अगर तर खजूरें दस्तयाब न होतीं, तो ख़ुश्क खजूरों से इफ़तार फ़रमाते थे और अगर ख़ुश्क खजूरें भी दस्तेयाब न होतीं, तो चंद धोंट पानी नोश फ़रमा लेते थे.
(२६) इफ़तार के बाद निम्नलिखित दुआ पढ़िएः
اَللّهُمَّ لَكَ صُمْتُ وَعَلى رِزْقِكَ أَفْطَرْتُ فَتَقَبَّلْ مِنِّيْ إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ العَلِيم
ऐ अल्लाह ! में ने आप ही के लिए रोज़ा रखा और आप ही की रोज़ी से इफ़तार किया. आप मेरा रोज़ा क़बूल फ़रमाइए. बेशक आप ज़्यादह सुनने वाले और जानने वाले हैं.
ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللَّهُ
प्यास बुझ गई और रगें तर हो गईं और अज्रो षवाब षाबित(और हासिल) हो गया.
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِرَحْمَتِكَ الَّتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ أَنْ تَغْفِرَ لِي
ऐ अल्लाह! तेरी उस रहमत के सदके, जो हर चीज़ को शामिल है, यह मांगता हूं कि तू मेरी मग्फ़िरत फर्मा दे।
يَا وَاسِعَ الْمَغْفِرَةِ اغْفِرْ لِي
ऐ बहुत ज़्यादह मग्फ़िरत करने वाले! मेरी मग्फ़िरत फ़र्मा।
(२७) अगर आप के लिए मुमकिन हो, तो रमज़ान के अख़ीर अशरह(दस दिन) में ऐतेकाक़ कीजिए.
عن ابن عباس الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه و سلم قال في المعتكف هو يعتكف الذنوب ويجري له من الحسنات كعامل الحسنات كلها (ابن ماجة رقم ۲۱٠۸)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास(रज़ि.) से मरवी है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने ऐतेकाफ़ करने वाले के बरे में फ़रमाया के जो आदमी ऐतेकाफ़ में बेठता है, तो वह अपने आप को गुनाहों से महफ़ूज़ करता है और उस के लिए सारी नेकियां जारी रेहती है(यअनी सारी नेकियां उस के नामऐ आमाल में लिखी जाती हैं) और वह उस आदमी की तरह होता है जो सारी नेकियां करता है(यअनी ऐतेकाफ़ से पेहले वह जिन नेकियों का आदी था और ऐतेकाफ़ की वजह से वह उन सारी नेकियों को नहीं कर सकता है, अल्लाह तआला उस को उन सारी नेकियों का षवाब अता कर देते है).
عن ابن عباس الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه و سلم قال من اعتكف يوما ابتغاء وجه الله تعالى جعل الله بينه وبين النار ثلاث خنادق أبعد مما بين الخافقين رواه الطبراني في الأوسط والبيهقي واللفظ له (الترغيب رقم ۱٦۵٠)
हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास(रज़ि.) से मरवी है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)ने इरशाद फ़रमाया के जो शख़्स अल्लाह तआला की ख़ुशनुदी के ख़ातिर ऐक दिन ऐतेकाफ़ करता है, अल्लाह तआला उस के और जहन्नम के दरमियान तीन ख़नदक़ों का फ़ास्ला कर देते हैं. हर ख़नदक़ के बीच मशरिक़(पूरब) व मग़रिब(पछ्चीम) की दूरी के बक़दर फ़ास्ला होता है.
(२८) रमज़ान के अख़ीर अशरह(दस दिन) की ताक़(ऐकी) रातों में शबे क़द्र तलाश कीजिए.
عن أنس بن مالك قال : دخل رمضان فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم : إن هذا الشهر قد حضركم وفيه ليلة خير من ألف شهر من حرمها فقد حرم الخير كله ولا يحرم خيرها إلا محروم (ابن ماجه رقم ۱٦٤٤)
हज़रत अनस बिन मालिक(रज़ि.) फ़रमाते हैं के जब रमज़ान शुरू हुवा, तो रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)ने इरशाद फ़रमाया के बेशक रमज़ान का महीना तुम्हारे पास आ गया. उस में ऐक ऐसी रात है जो हज़ार महीनों से अफ़ज़ल है. जो शख़्स इस रात की बरकत और फ़ैज़ से महरूम रह गया, वह तमाम भलाइयों से महरूम रह गया. और वाक़ई बदनसीब शख़्स वही है जो इस की भलाइयों से महरूम रेहता है.
(२९) ताक़ (ऐकी) रातों में सोने से पेहले कुछ समय इबादत(प्रार्थना) में सर्फ़(खर्च) कीजिए. फिर तहज्जुद के लिए बेदार होने की निय्यत करे ताकि तुम उसी समय ज़्यादह इबादत कर सकोगे. इबादत किए बग़ैर मत सोइए इस लिए के आंख न खुल और बा बरकत रात गुज़र जाए.
(३०) शबे क़द्र में निम्नलिखित दुआ पढ़िएः
اَللّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنّيْ
ए अल्लाह ! बेशक आप सब से ज़्यादह माफ़ करने वाले हैं. आप माफ़ी को पसंद करते हैं. मुझे माफ़ फ़रमाइए.
عن عائشة قالت : قلت يا رسول الله أرأيت إن علمت أي ليلة ليلة القدر ما أقول فيها ؟ قال قولي اللهم إنك عفو تحب العفو فاعف عني قال هذا حديث حسن صحيح (ترمذي رقم ۳۵۱۳)
हज़रत आंइशा(रज़ि.) ने फ़रमाया के में ने रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) से अर्ज़ किया के ए अल्लाह के रसूल(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)! अगर मुझे मालूम हो जाए के कोनसी शब, शबे क़द्र है, तो में उस में कौनसी दुआ मांगु? रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने जवाब दिया के तुम यह मांगोः
اَللّهُمَّ إِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنّيْ
(३१) जो शख़्स इशा फ़जर और तरावीह की नमाज़ बा जमाअत पढ़ता है, अल्लाह तआला इस को पूरी रात इबादत करने का षवाब अता फ़रतामे हैं और अगर वह शब, शबे क़द्र होती है, तो अल्लाह तआला शबे क़द्र का षवाब अता फ़रमाते हैं.
عن عثمان رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : من صلى العشاء في جماعة فكأنما قام نصف الليل ومن صلى الصبح في جماعة فكأنما صلى الليل كله . (مسلم رقم ٦۵٦)
हज़रत उषमान(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)ने इरशाद फ़रमाया के जिस शख़्स ने इशा की नमाज़ जमाअत के साथ अदा की, तो गोया के उस ने आधी रात इबादत की और जिस ने फ़जर की नमाज़ जमाअत के साथ अदा की, तो गोया के उस ने पूरी रात इबादत की.
عن أبي ذر: قال … فقام بنا حتى ذهب ثلث الليل ثم لم يقم بنا في السادسة وقام بنا في الخامسة حتى ذهب شطر الليل فقلنا له يا رسول الله لو نفلتنا بقية ليلتنا هذه ؟ فقال إنه من قام مع الإمام حتى ينصرف كتب له قيام ليلة (ترمذي رقم ۸٠٦)
हज़रत अबु ज़र ग़िफ़ारी(रज़ि.) फ़रमाते हैं के हम ने रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) के साथ(रमज़ान का) रोज़ा रखा. तो आप(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने रमज़ान की पच्चीसवी रात हमारे साथ आधी रात तक तरावीह की नमाज़ पढ़ाई. तो हम ने अर्ज़ किया, ए अल्लाह के रसूल(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम)! काश आप हमें रात के बक़िय्यह हिस्से में भी नमाज़ पढ़ाते. तो आप(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने फ़रमाया के जिस ने इमाम के साथ नमाज़ पढ़ी, यहां तक के वह(नमाज़ पूरी कर के) लोटा, तो उस को पूरी रात इबादत करने का षवाब दिया जाएगा.
(३२) ईद की रात में जागिए और इबादत कीजिए.
عن أبي أمامة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه و سلم قال من قام ليلتي العيدين محتسبا لم يمت قلبه يوم تموت القلوب رواه ابن ماجه ورواته ثقات إلا أن بقية مدلس وقد عنعنه (الترغيب و الترهيب رقم ۱٦۵۵)
हज़रत अबु उमामह(रज़ि.) से रिवायत है के नबी(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने इरशाद फ़रमाया के जो शख़्स इदुल फ़ित्र और इदुल अज़हा की रातों में षवाब हासिल करने की उम्मीद करते हुए इबादत करेगा, उस का दिल उस दिन मुरदा नहीं होगा, जिस दिन(गुनहगारों के) दिल मुरदह हो जाऐंगे.
(३३) रमज़ान के बाद शव्वाल के छ(६) रोज़े रखने का एहतेमाम कीजिए.
عن أبي أيوب الأنصاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال : من صام رمضان ثم أتبعه ستا من شوال كان كصيام الدهر. (مسلم رقم ۱۱٦٤)
हज़रत अबु अय्युब अंसारी(रज़ि.) से रिवायत है के रसूलुल्लाह(सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम) ने फ़रमाया के जिस ने रमज़ान के रोज़े रखे फिर शव्वाल के छ(६) रोज़े रखे, तो उस को पूरे साल रोज़े रखने का षवाब मिलेगा.
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