फज़ाइले-सदकात – ३२

1.

हज़रत आमश सुलैमांन बिन महरान रहिमहुल्लाह मशहूर मुहद्दिस हैं, फ़रमाते हैं कि मेरे पास एक बकरी थी, वह बीमार हो गयी। हज़रत खैसमा बिन अब्दुर्रहमान रहिमहुल्लाह रोज़ाना सुबह को और शाम को दो वक़्त उस बकरी की इयादत करने मेरे पास तशरीफ लाते, बकरी का हाल पूछते और यह भी दर्याफ्त करते कि बच्चों को दूध तो मिलता नहीं होगा, वे ज़िद तो नहीं करते, बकरी ने कुछ खाया या नहीं, वगैरह वगैरह और हमेशा चलते हुए जिस टाट पर मैं बैठा करता था, उसके नीचे कुछ डाल जाते कि यह बच्चों के लिए उठा लेना।

बकरी की बीमारी के ज़माने में तीन सौ दीनार (अशर्फियों) से ज़्यादा मुझे उनके एहसान से मिला, मुझे यह ख़्वाहिश होने लगी कि यह बकरी बीमार ही रहे तो अच्छा है।

2.

अब्दुल मलिक बिन मरवान ने हज़रत असमा बिन ख़ारिजा रहिमहुल्लाह से पूछा कि मुझे तुम्हारी बाज़ आदतें बहुत अच्छी पहुँची हैं, तुम अपने मामूलात मुझे बताओ, उन्होंने उज़र कर दिया कि मेरी क्या आदत अच्छी हो सकती है, दूसरों की आदतें बहुत बहुत अच्छी हैं, उन से दर्याफ्त करें, मगर जब उन्हों ने इसरार से कसम देकर पूछा तो उन्होंने बताया कि मुझे तीन चीज़ का हमेशा एहतिमाम रहा :-

(अ) यह कि किसी बैठने वाले की तरफ मैं ने पांव नहीं फैलाया।

(ब) जब मैं ने खाना पकाया और उस पर लोगों को बुलाया तो उन खाने वालों का मैं ने अपने ऊपर एहसान इससे बहुत ज़्यादा समझा जितना मेरा उन पर हो।

(स) जब मुझसे किसी ज़रूरत मंद ने कोई सवाल किया, मैं ने उसके देने में किसी मिक्दार को भी ज़ायद नहीं समझा जो कुछ दिया, उसको हमेशा कम ही समझता रहा।

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