उस्ताद की बे-अदबी इल्म से महरूमी का सबब

शेख़ुल-हदीस हज़रत मौलाना मुह़म्मद ज़करिय्या रह़्मतुल्लाही अलैह ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमाया:

“मेरी बड़े एहतिमाम से तुम लोगों से दरख़्वास्त है कि इल्म हासिल करने में जितनी भी तवाज़ु हो सके (करना), ज़बानी नहीं, बल्कि दिल से इख़्तियार करना।

अगर चाहो कि इल्म हासिल हो जाए, तो उस्ताद का अदब करना। जितना अदब करोगे, उतना ही इल्म हासिल होगा।

मैंने अपने बचपन के दौर में ख़ुद देखा है कि उस वक़्त मुसलमान उस्ताद का ग़ैर-मुस्लिम शागिर्द और ग़ैर-मुस्लिम उस्ताद का मुसलमान शागिर्द बहुत बड़े दर्जे का ओहदेदार होने के बाद भी अपने उस्ताद का इकराम करता था।”

(मल्फ़ूज़ाते-हज़रत शेख़ रहमतुल्लाही अलैह, हिस्सा अव्वल, पेज: ३६-३७)

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