फज़ाइले-सदकात – ३०

अब्दुल हमीद बिन-सा’द की सखावत

एक मर्तबा मिसर में कहत पड़ा। अब्दुल हमीद बिन-सा’द मिस्र के हाकिम थे, कहने लगे:

मैं शैतान को बताऊँगा कि मैं उसका दुश्मन हूँ (वह ऐसे वक़्त में बहुत एहतियात से ख़र्च करने की तर्गीब देता है।)मिस्र में जितने फुकरा नादार थे, सबका खाना मेरे ज़िम्मे रहेगा।

चुनांचे ऐसा होता रहा, यहां तक कि क़हत दूर हो गया। बाज़ार का नर्ख (भाव) अर्ज़ा (सस्ता) हो गया।

उसके बाद यह माज़ूल कर दिये गये। जब यह मिस्र से रूख़्सत होने लगे तो जिन ताजिरों से क़हत रहा ज़माने में कर्ज़ लेकर खिलाते रहे उनके दस लाख दिरम उनके ज़िम्मे कर्ज़ था।

चूंकि वहां से रूख़्सत होकर जा रहे थे, इसलिए अपने अहल व ‘अयाल के ज़ेवर वगैरह मांग कर उन ताज़िरों के पास रहन रख गये, जो चीज़ें रहन रखीं थीं, उनकी क़ीमत पचास करोड़ दिरम थी।

कुछ दिन इरादा करते रहे कि उनका कर्ज़ा अदा होकर ज़ेवरात के रहन को खलास कर लें, मगर इतनी रकम मुहैया न हो सकी। उन ताजिरों को लिख दिया कि उन ज़ेवरों को फरोख्त करके अपना कर्ज़ा वसूल कर लें और जितनी रकम बाकी बचे, वह मिस्र के उन अहले-ज़रूरत पर तक़्सीम कर दें जिनकी उस वक़्त मैं ने मदद नहीं की। (इत्तिहाफ)

ज़ेवर वालियां भी तो उसी दौर की पैदावार थीं, उनको इसमें क्या ताम्मुल हो सकता था, कि उनका ज़ेवर फरोख्त करके फुक़रा पर तक़्सीम कर दिया जाये।

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