फज़ाइले-आमाल – ३९

हज़रत अली बिन माबद रह का किराये के मकान से तहरीर को ख़ुश्क करना

अली बिन माबद रह० एक मुहद्दिस हैं, फर्माते हैं, मैं एक किराये के मकान में रहता था।

एक मर्तबा मैंने कुछ लिखा और उसको खुश्क करने के लिए मिट्टी की _ ज़रूरत हुई कच्ची दीवार थी। मुझे ख्याल आया कि इस पर से ज़रा सी खुरच के तहरीर पर डाल लूं, फिर ख्याल आया कि मकान किराये का है (जो रहने के वास्ते किराये पर लिया गया, न मिट्टी लेने के वास्ते) मगर साथ ही यह ख्याल आया कि इतनी ज़रा सी मिट्टी में क्या मूजायका है। मामूली चीज है।

मैंने मिट्टी लें ली और रात को ख्वाब में देखा कि एक साहब खड़े हैं, जो यह फर्मा रहे हैं कि कल क़्यामत को मालूम होगा, यह कहना कि मामूली मिट्टी क्या चीज़ हैं?

फायदा: कल मालूम होगा” का ब-जाहिर मतलब यह है कि तक्वा के दरजात बहुत ज्यादा हैं, कमाल दर्जा यह यकीनन था कि इससे भी एहतराज’ किया जाता अंगर्चे उर्फन मामूली चीज़ शुमार होने से जवाज़ की हृद में था।

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