फज़ाइले-सदकात – ३१

अबू मर्सद की सखावत

अबू मर्सद रह० एक मशहूर सखी हैं, उनके पास एक शख़्स आया और कुछ अश्आर उनकी तारीफ में पढ़े (करीम की मदह हमेशा सूरते सवाल होती ही है) उन्हों ने फरमाया कि मेरे पास इस वक़्त तेरे देने के लिए बिल्कुल कुछ नहीं है। एक सूरत हो सकती है कि तू काज़ी के यहां जाकर मुझ पर दस हज़ार का दावा कर दे मैं काज़ी के सामने इसका इकरार कर लूँगा (और आदमी का किसी से वायदा कर लेना भी क़र्ज़ ही जैसा है, हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पाक इर्शाद है कि ٌ العِدَةُ دَيْن (वायदा कर्ज़ है,)

काज़ी तेरे कर्जे में मुझे कैद कर देगा तो फिर मेरे घर वाले मुझे कैद में तो रहने नहीं देंगे, इतनी मिक्दार जमा कर देगें।

उसने ऐसा ही किया, यह कैद हो गये और शाम तक दस हज़ार काज़ी साहब के हवाले होकर यह कैद से छूट आये और वह रकम उस शख़्स को मिल गई।

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