सवाल: मोहतरम मुफ़्ती साहब! मौजूदा फुटबॉल वर्ल्ड कप (Football World Cup) के बारे में यह पूछना है कि लोग अपनी पसंदीदा टीम की जीत के लिए दुआ करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं, सदक़ा देते हैं और कुछ लोग अपनी पसंदीदा टीम के गोल करने या मैच जीतने पर सज्दा करते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं। क्या यह सब जाइज़ है?
कुछ लोग इस बारे में इस्लाही बात (सुधार की बात) सुनकर कहते हैं कि दीन और खेल-कूद (मनोरंजन) को अलग रखो! दोनों को आपस में न मिलाओ। क्या ऐसा कहना दुरुस्त है?
जवाब: क़ुरआन मजीद में अल्लाह तअ़ाला ने कई जगहों पर (‘لهو ولعب‘) खेल-कूद और फ़ुज़ूल चीज़ों की मज़म्मत (बुराई) बयान फ़रमाई है। मुसलमानों को चाहिए कि वे इस क़िस्म की चीज़ों से दूर रहें।
अल्लाह तअ़ाला ने हमें इस दुनिया में इसलिए नहीं भेजा है कि हम काफ़िरों की तरह ज़िंदगी गुज़ारें और उन्हीं की तरह खेल-कूद को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लें।
जब हम इस वर्ल्ड कप का जायज़ा लेते हैं, तो हमें मालूम होता है कि इस वर्ल्ड कप के खेल में बहुत सी ख़राबियाँ हैं:
1. वहाँ मर्दों और औरतों का इख़्तिलात (मेल-जोल) होता है।
2. वहाँ का माहौल गुनाहों से भरा हुआ होता है और लोग मैच देखने की वजह से नमाज़ें क़ज़ा कर देते हैं।
3. वहाँ गाना और म्यूज़िक होता है।
4. क़िमार (जुआ/बेटिंग) होता है और लोग खुलेआम शराब पीते हैं।
5. इस हराम खेल को टीवी पर नश्रो-इशाअत (Broadcast) किया जाता है।
6. इस क़िस्म के मैच और टीम को ऐसी कम्पनियाँ स्पॉन्सर करती हैं, जो हराम चीज़ों को बढ़ावा देती हैं।
7. जहाँ तक खिलाड़ियों की बात है, तो बहुत बार खेल के दौरान उनके सतर (शरीर का वह हिस्सा जिसे छिपाना फ़र्ज़ है) का हिस्सा खुला हुआ होता है।
8. और इसके अलावा भी दूसरे बहुत से गुनाह और बुराइयाँ वहाँ मौजूद होती हैं।
चूँकि मुसलमानों के लिए ऐसी जगह जाना जाइज़ नहीं है। वहाँ जाने से इंसान अल्लाह तअ़ाला के ग़ज़ब (नाराज़गी) का हक़दार बनता है। इसी तरह मैच को टीवी पर देखना भी हराम है; क्योंकि (जानदार की) तस्वीर की हुर्मत (हराम होने का हुक्म) हदीस-शरीफ़ में आई है:
रसूलुल्लाह सल्लाल्लाहु अलैहि व-सल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
إن أشد الناس عذابا عند الله يوم القيامة المصورون
तर्जुमा: “बेशक क़ियामत के दिन अल्लाह तअ़ाला के यहाँ (जानदार की) तस्वीर बनाने वालों को सबसे सख़्त अज़ाब मिलेगा।” (सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नम्बर: 5950)
लिहाज़ा, टीम की कामयाबी के लिए दुआ करना, नमाज़ पढ़ना, सदक़ा देना या टीम के गोल करने या मैच जीतने पर सज्दा करना और नमाज़ पढ़ना, ये सारे काम ना-जाइज़ हैं; क्योंकि ये तमाम चीज़ें (वर्ल्ड कप के सारे मैच) दीन के ख़िलाफ़ हैं। और जो चीज़ें दीन के ख़िलाफ़ हों, उनकी कामयाबी के लिए कोई मुसलमान भला कैसे दुआ कर सकता है? या नमाज़ पढ़ सकता है? या सदक़ा दे सकता है?
अगर किसी ने इन हराम चीज़ों के लिए दुआ की, सदक़ा दिया या नमाज़ पढ़ी, तो उसे चाहिए कि वह सच्चे दिल से तौबा करे और आइंदा इससे परहेज़ (बचाव) करे।
अल्लाह तअ़ाला हमें गुनाहों से बचाएं और हमें दीन की सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाएं।
फ़क़त और अल्लाह तअ़ाला ही सब से ज़्यादा जानने वाले हैं।
وَإِذَا رَأَيْتَ الَّذِينَ يَخُوضُونَ فِي آيتِنَا فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ حَتَّىٰ يَخُوضُوا فِي حَدِيثٍ غَيْرِهِ وَإِمَّا يُنسِيَنَّكَ الشَّيْطنُ فَلَا تَقْعُدْ بَعْدَ الذِّكْرَىٰ مَعَ الْقَوْمِ الظّلِمِينَ (سورة الأنعام: 68)
وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصرىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّـهِ هُوَ الْهُدَىٰ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَ الَّذِي جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ مَا لَكَ مِنَ اللَّـهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ ﴿البقرة: ١٢٠﴾
يأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا ادْخُلُوا فِي السِّلْمِ كَافَّةً وَلَا تَتَّبِعُوا خُطُوتِ الشَّيْطنِ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ ﴿البقرة: ٢٠٨﴾
يأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الْيَهُودَ وَالنَّصَارَىٰ أَوْلِيَاءَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ إِنَّ اللَّـهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظّلِمِينَ ﴿المائدة: ٥١﴾
أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنكُمْ عَبَثًا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ ﴿المؤمنون: ١١٥﴾
عن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري رضي الله عنه عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لا ينظر الرجل إلى عورة الرجل ولا المرأة إلى عورة المرأة ولا يفضي الرجل إلى الرجل في ثوب واحد ولا تفضي المرأة إلى المرأة في الثوب الواحد (صحيح مسلم، الرقم: 338)
عن علي رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لا تبرز فخذك ولا تنظرن إلى فخذ حي ولا ميت (سنن أبي داود، الرقم: 3140)
عن عمرو بن الحارث أن رجلا دعا عبد الله بن مسعود إلى وليمة فلما جاء ليدخل سمع لهوا فلم يدخل فقال ما لك رجعت قال إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول من كثر سواد قوم فهو منهم ومن رضي عمل قوم كان شريكا في عملهم (إتحاف الخيرة المهرة، الرقم: 3297)
عن عبيد بن عمير قال: صليت خلف عمر رضي الله عنه صلاة الغداة فقنت فيها بعد الركوع وقال في قنوته: اللهم إنا نستعينك ونستغفرك , ونثني عليك الخير كله ونشكرك ولا نكفرك ونخلع ونترك من يفجرك اللهم إياك نعبد ولك نصلي , ونسجد وإليك نسعى ونحفد نرجو رحمتك ونخشى عذابك إن عذابك بالكفار ملحق (شرح معاني الآثار، الرقم: 1475)
حدثنا الأعمش عن مسلم قال كنا مع مسروق في دار يسار بن نمير فرأى في صفته تماثيل فقال سمعت عبد الله قال سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول إن أشد الناس عذابا عند الله يوم القيامة المصورون (صحيح البخاري، الرقم: 5950)
وظاهر كلام النووي في شرح مسلم الإجماع على تحريم تصوير الحيوان وقال وسواء صنعه لما يمتهن أو لغيره فصنعته حرام بكل حال لأن فيه مضاهاة لخلق الله تعالى وسواء كان في ثوب أو بساط أو درهم وإناء وحائط وغيرها ا هـ فينبغي أن يكون حراما لا مكروها إن ثبت الإجماع أو قطعية الدليل بتواتره (رد المحتار 1/647)
وكذا النهي إنما جاء عن تصوير ذي الروح لما روي عن علي رضي الله عنه أنه قال من صور تمثال ذي الروح كلف يوم القيامة أن ينفخ فيه الروح وليس بنافخ فأما لا نهي عن تصوير ما لا روح له لما روي عن ابن عباس رضي الله عنه أنه نهى مصورا عن التصوير فقال كيف أصنع وهو كسبي فقال إن لم يكن بد فعليك بتمثال الأشجار (بدائع الصنائع 1/116)
والحاصل أنه يحرم تصوير حيوان عاقل أو غيره إذا كان كامل الاعضاء إذا كان يدوم إجماعا، وكذا إن لم يدم على الراجح كتصويره من نحو قشر بطيخ ويحرم النظر إليه إذ النظر إلى المحرم حرام … وغير ذي ظل كالمنقوش في حائط أو ورق فيكره (حاشية الدسوقي على الشرح الكبير 3/201)
قال أصحابنا وغيرهم من العلماء تصوير صورة الحيوان حرام شديد التحريم وهو من الكبائر لأنه متوعد عليه بهذا الوعيد الشديد المذكور في الأحاديث وسواء صنعه بما يمتهن أو بغيره فصنعته حرام بكل حال لأن فيه مضاهاة لخلق الله تعالى وسواء ما كان فى ثوب أو بساط أودرهم أو دينار أو فلس أو اناء أو حائط أو غيرها وأما تصوير صورة الشجر ورحال الابل وغير ذلك مما ليس فيه صورة حيوان فليس بحرام هذا حكم نفس التصوير وأما اتخاذ المصور فيه صورة حيوان فان كان معلقا على حائط أو ثوبا ملبوسا أو عمامة ونحوذلك مما لايعد ممتهنا فهو حرام وان كان في بساط يداس ومخدة ووسادة ونحوها مما يمتهن فليس بحرام ولكن هل يمنع دخول ملائكة الرحمة ذلك البيت فيه كلام نذكره قريبا إن شاء الله ولافرق في هذا كله بين ماله ظل وما لا ظل له هذا تلخيص مذهبنا في المسألة وبمعناه قال جماهير العلماء من الصحابة والتابعين ومن بعدهم وهو مذهب الثوري ومالك وأبي حنيفة وغيرهم (شرح النووي على المسلم مع صحيح لمسلم 2/199)
दारुल-इफ़्ता, मद्रसा तालीमुद्दीन
इसपिंगो बीच, डरबन, दक्षिण अफ़्रीका
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