
दज्जाल की आमद (आने) से पहले उम्मत का गिरना
हदीस शरीफ़ में आया है कि क़ियामत से पहले लोगों की ज़िंदगी का सब से पहला मक़सद और असल मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा माल जमा करना होगा। लोग माल को इस निगाह से देखेंगे कि माल ही तमाम राहतों और आसानी की कुंजी (चाबी), हर क़िस्म की ख़ुशी और मनोरंजन का दरवाज़ा और तमाम लज़्ज़तों और दुनियावी ख़्वाहिशात (इच्छाओं) को पूरा करने का ज़रीआ है; लिहाज़ा वह माल हासिल करने के लिए सब कुछ लुटा देंगे और कुछ भी करने के लिए तैयार हो जायेंगे।
माल-ओ-दौलत की बे-पनाह लालच उन पर इस तरह ग़ालिब आएगी कि वह उन्हें अपने दीनी फ़र्ज़ व वाजिब चीज़ो से बिल्कुल बेख़बर बना देगी। वह माल व दौलत के हुसूल के लिए अपने मामलों में बे-परवाह होंगे; चुनांचे अगर उन्हें ज़्यादा माल व दौलत को हासिल करने के लिए शरीअत के अहकाम को नज़र-अंदाज़ करने या उनकी ख़िलाफ़-वर्ज़ी करने पर मजबूर किया जाएगा, तो वह ऐसा करने से दरेग़ (संकोच) नहीं करेंगे।
जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम का इरशाद है कि अन-क़रीब लोगों पर एक ऐसा ज़माना आएगा कि इन्सान अपनी कमाई के हुसूल के बारे में परवाह नहीं करेगा कि वह हलाल तरीक़े से कमावे या हराम तरीक़े से कमावे। (सहीह अल-बुख़ारी, रक़म: २०५९)
एक और हदीस में वारिद (आया) है कि क़ियामत से पहले माल की मोहब्बत की वजह से लोग दुनिया के थोड़े से माल के बदले अपना दीन बेचने के लिए तैयार हो जाएंगे।
चुनांचे रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व-सल्लम का फ़रमान है कि फ़ितनों के आने से पहले नेक आमाल की तरफ़ जल्दी करो, जो अंधेरी रात के टुकडो की तरह होंगे। आदमी सुबह को मोमिन होगा और शाम को काफ़िर हो जाएगा या आदमी शाम को मोमिन होगा और सुबह को काफ़िर हो जाएगा। वह दुनिया की मामूली सी चीज़ के बदले अपना दीन व ईमान बेच डालेगा। (सहीह मुस्लिम, रक़म: ११८)
अगर कोई शख़्स मुसलमानों की मौजूदा बद-हाली और उम्मत को दरपेश (सामने) मुख़्तलिफ़ हालात का जाइज़ा ले, तो उसे अच्छी तरह अंदाज़ा हो जाएगा कि यह सब वही बातें हैं, जिनका ज़िक्र ऊपर बताई गई अहादीस में किया गया है।
एक हदीस में आया है कि जब दज्जाल का ज़ुहूर (जाहिर होना) होगा, तो वह लोगों को गुमराह करने के लिए इसी हथियार यानी माल व दौलत का इस्तेमाल करेगा।
दज्जाल और उसके एजेंटों की साज़िश
कुछ साल पहले एक आलिम रिफ़ाही कामों (कल्याणकारी कामों) के सिलसिले में बोस्निया जा रहे थे। हवाई जहाज़ में वह एक यहूदी के पास बैठे हुए थे। परवाज़ (उड़ान) के दौरान वह दीन के बारे में बात करने लगे। यह आलिम उस वक़्त बहुत हैरान हुए जब उस यहूदी ने उनसे कहा कि हम ने आपके दीने-इस्लाम का मुताला (अध्ययन) किया है और आपके क़ुरआन व हदीस को भी पढ़ा है। शायद हम आपके दीन को आपसे बेहतर जानते हैं।
उसके बाद यहूदी ने कहा कि आपके दीन का मुताला करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि आप मुसलमानों को अल्लाह तआला की नुसरत व मदद हासिल है और इसी वजह से यहूदी लोग आप लोगों को पूरे तौर पर शिकस्त देने और मग़्लूब (काबू) करने में कामयाब नहीं हो सके। ताहम, हम ने आप लोगों की किताबों का मुताला किया ताकि हम आप लोगों की कमज़ोरियों और उन चीज़ों को तलाश कर सकें, जिनकी वजह से आप लोग अल्लाह तआला की मदद से महरूम (वंचित) हो जाएं।
आप लोगों के दीन का मुताला करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे कि हमें सिर्फ़ चार काम करने की ज़रूरत है, जिनकी वजह से आप मुसलमान लोग अल्लाह तआला की मदद से महरूम हो जाएंगे।
फिर उस यहूदी ने उस आलिम से नीचे लिखी चार चीज़ें बयान कीं:
(१) हमें मुसलमानों को मुख़्तलिफ़ क़िस्म के खेल, फ़िज़ूल चीज़ों और दीगर मनोरंजन की चीज़ों में मश्ग़ूल करने की ज़रूरत है ताकि वह अपने दीनी फ़र्ज़ व वाजिब और अल्लाह तआला के हुक़ूक़ से ग़ाफ़िल हो जाएं।
(२) हमें मुसलमान औरतों को उनके घरों से निकाल कर मुख़्तलिफ़ दुनियावी ओहदों पर फ़ाइज़ (नियुक्त) करने की ज़रूरत है ताकि अजनबी मर्दों के साथ उनका इख़्तिलात (मेल-जोल) हो और वह हर क़िस्म के शर्मनाक कामों का इर्तिकाब (गलती) करें, जिससे उनकी इफ़्फ़त व हया और पाक-दामनी ख़त्म हो जाए।
(३) हमें उन्हें रिबा और सूद (ब्याज) में मुब्तला करने की ज़रूरत है। इस मक़सद की तकमील के लिए हम उन्हें बैंकों का ग़ुलाम बनाएंगे और उन्हें इस निज़ाम में फंसाने की पूरी कोशिश करेंगे। इसका नतीजा यह निकलेगा कि वह सूदी निज़ाम में पूरे तौर पर फंस जाएंगे।
(४) आख़िर में, हमें मुसलमानों के दरम्यान आपसी फूट पैदा करने की ज़रूरत है। हम ऐसे तरीक़े तलाश करेंगे, जिनके ज़रीए हम अवाम (जनता) को उलमा-ए-हक़ से दूर कर देंगे और उलमा पर अवाम का भरोसा ख़त्म कर देंगे; चुनांचे हर शख़्स अपने-अपने रास्ते पर चलेगा और वह दीन को अपने हाथ में ले लेगा। इसका अफ़सोसनाक नतीजा यह ज़ाहिर होगा कि मुसलमानों की ज़िंदगी में दीन बाक़ी नहीं रहेगा।
यह बातें बता कर यहूदी ने कहा कि जो मन्सूबें (योजनाएं) उन्होंने बनाए थे, वह उनमें कामयाब हो चुके हैं।
यही वजह है कि हम देखते हैं कि उम्मते-मुस्लिमा दीन से बहुत दूर हो चुकी है और अल्लाह तआला की तरफ़ से उनकी मदद नहीं हो रही है।
यहुदियों ने उम्मते-मुस्लिमा को गुमराह करने के लिए जो मन्सूबें इख़्तियार किए, हम देखते हैं कि जब दज्जाल का ज़ुहूर होगा, तो वह लोगों को दीन व ईमान से महरूम करने के लिए इसी मन्सूबें (यानी औरत, माल व दौलत और मनोरंजन) को अपनाएगा।
अल्लाह तआला हमारे और पूरी उम्मते-मुस्लिमा के दीन व ईमान की हिफ़ाज़त फ़रमाए। आमीन या रब्बल ‘आलमीन।
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