शोहरत के मुताल्लिक़ मज़ाक़

हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी रह़मतुल्लाहि ‘अलैह ने एक मर्तबा इर्शाद फ़रमाया:

उम्मत की ख़िदमत और उनके दीन की हिफ़ाज़त करना चाहिए। अपनी शोहरत में क्या रखा है?

शोहरत के मुताल्लिक़ तो बस यह मज़ाक़ (रग़बत,चाहत) चाहिए कि न ज़िंदगी में किसी को ख़बर हो कि फ़ुलां शख़्स भी दुनिया में है या फ़ुलां शख़्स ने यह काम किया है। न मरने के बाद किसी की ज़बान पर नाम तक आए कि कौन था और कौन मर गया, क्या काम कर गया। (मलफ़ूज़ाते-हकीमुल-उम्मत, जिल्द १०, सफ़ा १९)

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