
हज़रत मौलाना मुह़म्मद इल्यास साहब रह़्मतुल्लाह अलैह ने एक मर्तबा इर्शाद फ़रमाया:
लोगों को हदिया, सदक़ा और क़र्ज़ के फ़ज़ाइल वाक़िआते-सहाबा रज़ियल्लाहु त’आला अ़न्हुम से बतलाना चाहिएं। सहाबा रज़ियल्लाहु त’आला अ़न्हुम मज़दूरी कर के सदक़ा करते थे।
उन में सिर्फ़ अग़्निया (मालदार) ही सदक़ा नहीं करते थे। ग़रीब भी मज़दूरी कर के कुछ न कुछ सदक़ा किया करते थे; क्योंकि सदक़ा के फ़ज़ाइल उन की नज़र में थे।
और जब सदक़ा का यह दर्जा है, तो हदिया तो उस से भी अफ़ज़ल है।
इसी तरह क़र्ज़ देने के भी बहुत फ़ज़ाइल हैं; मसलन जिस वक़्त क़र्ज़ की मुद्दत पूरी हो जाए, उस के बाद तंगदस्त मक़रूज़ (लाचार कर्ज़दार) को अगर मोहलत दी गई, तक़ाज़ा (मांगना) न किया गया, तो हर दिन सदक़ा का सवाब मिलता है। (मल्फ़ूज़ाते हज़रत मौलाना मुह़म्मद इल्यास रह़्मतुल्लाह अलैह, पेज नंबर. ५०)
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