
शैखुल-हदीस हज़रत मौलाना मुह़म्मद ज़करिया रह़्मतुल्लाह अलैह ने एक मर्तबा इर्शाद फ़रमाया:
एक साहब ने ख़त लिखा था कि किब्र (तकब्बुर) के निकलने की अलामत क्या है?
मैंने जवाब में लिखवाया कि अगर कोई तुम पर ए’तिराज़ करे, तनक़ीद करे, बुरा कहे, तो देखो! तुम्हारे क़ल्ब (दिल) पर उस का क्या असर पड़ता है।
अगर तुम्हारे ज़ेहन में यह बात आई कि इस ए’तिराज़ पर ग़ौर किया जाए। अगर सही होगा, तो हम उस की इस्लाह करेंगे, तो याद रखो! यह अलामत है किब्र (तकब्बुर) दूर होने की और अगर ए’तिराज़ व तनक़ीद सुनते ही बिला सोचे, समझे ग़ुस्सा आता है, तो यह अलामत है तकब्बुर की। (मल्फ़ूज़ाते हज़रत शैख रह़्मतुल्लाह अलैह, हिस्सा अव्वल, पेज नंबर. ७१)
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