
हज़रत लैस बिन-सा’द रह़िमहुल्लाह की सखावत
हारून रशीद ने पांच सौ दीनार (अशर्फियां) एक मर्तबा हज़रत इमाम मालिक रह़िमहुल्लाह की नज़र किये। हज़रत लैस बिन-सा’द रह़िमहुल्लाह को इसका इल्म हुआ तो उन्होनें एक हज़ार दीनार हज़रत इमाम मालिक रह़िमहुल्लाह के पास भेजे।
बादशाह को इसका इल्म हुआ तो वह नाराज़ हुए कि तुम रिआया (प्रजा) होकर बादशाह से बढ़ना चाहते हो (गोया मेरी तौहीन मक़्सूद है) लैस रह़िमहुल्लाह ने कहा, अमीरूल-मोमिनीन! यह बात नहीं है बल्कि आज कल मेरी रोज़ाना की आमदनी एक हज़ार दीनार है। मुझे गैरत आई कि इतने बड़े जलीलुल-कद्र इमाम को मैं नज़राना पेश करूँ और अपनी एक दिन से भी कम की आमदनी दूँ।
हज़रत लैस रह़िमहुल्लाह का मुस्तकिल मामूल भी था कि हज़रत इमाम मालिक रह़िमहुल्लाह की खिदमत में सौ अशर्फी सालाना नज़राना पेश किया करते थे, इनके अलावा भी नज़राने आते रहते थे लेकिन इसके बावजूद अल्लाह के फज़ल से हज़रत इमाम मालिक रह़िमहुल्लाह बसा औकात कर्ज़दार रहते थे और खुद यह हज़रत लैस बिन-सा’द रह़िमहुल्लाह मशहूर मुहद्दिसीन और उलमा में हैं जिनकी रोज़ाना की उस वक़्त की आमदनी एक हज़ार दीनार (अशर्फियां) थीं, मगर उम्र भर में कभी उनके ज़िम्मे ज़कात वाजिब नहीं हुई।
मुख्तलिफ ज़मानों में उनकी आमदनी मुख्तलिफ रही थी और ऐसा हुआ ही करता है कि आमदनी कमो-बेश होती रहा करती है, लेकिन ज़कात किसी जमाने में भी वाजिब न हुई कि ज़कात तो जब वाजिब हो जब कोई जमा करके रखे भी।
मुह़म्मद बिन-रुमह रह़िमहुल्लाह कहते हैं कि हज़रत लैस रह़िमहुल्लाह की सालाना आमदनी हर साल अस्सी हज़ार दीनार थी, मगर अल्लाह त’आला ने कभी उन पर एक दिरम की ज़कात भी वाजिब नहीं की। खुद उनके बैटे शोएब रह़िमहुल्लाह कहते हैं कि मेरे वालिद की आमदनी बीस पचीस हज़ार दीनार (अशर्फियां) सालाना थी, मगर वह हमेशा कर्ज़दार ही रहते थे।
शुरू में बीस पचीस हज़ार होगी जिस पर कर्ज़ा होता रहता था, इसके बावजूद वह सब कुछ अल्लाह के रास्ते में खर्च कर देते थे, इस वजह से उसका बढ़ना ज़रूरी था, इसलिए किसी वक़्त में एक हज़ार रोज़ाना भी हो गया।
एक औरत हज़रत लैस रह़िमहुल्लाह के पास एक प्याली लेकर आयी कि मुझे थोड़े से शहद की ज़रूरत है, अगर आपके पास हो तो मरहमत फरमा दीजिए। उन्हों ने एक मश्क शहद की उसके हवाले कर दी।
किसी ने कहा कि वह थोड़ा सा मांगती थी, आपने फ़रमाया कि यह उसका फेल (काम) था कि उसने अपनी हाजत के ब-कद्र मांगा, मुझे उसके मुवाफिक देना चाहिए था, जितना मेरे अल्लाह ने मुझ पर एहसान फरमा रखा है।
एक मर्तबा कुछ लोगों ने उनके एक बाग़ का फल खरीदा, उसमें ख़रीदारों को नुक्सान हुआ, उनको इत्तिला हुई। उन्हों ने बाग़ की बैअ (खरीद-फरोख्त) का मामला फस्ख़ कर दिया, उनकी कीमत वापस कर दी और उनको अपने पास से पचास हज़ार दीनार (अशर्फियां) नज़र किये।
किसी ने पूछा कि यह किस चीज़ का तावान दिया? फरमाने लगे कि उन लोगों ने मेरे बाग से नफे की उम्मीद बांधी थी, मेरा दिल चाहा कि उनकी उम्मीद पूरी कर दूँ।
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