
हज़रत मौलाना मुहम्मद इल्यास साहिब रह़िमहुल्लाह ने एक मर्तबा इर्शाद फरमाया:
सब कारकुनों को समझा दो कि इस राह में बलाओं और तकलीफ़ों को ख़ुदा से मांगें तो हरगिज़ नहीं (बंदा को अल्लाह से हमेशा आफ़ियत ही मांगनी चाहिए; लेकिन अगर अल्लाह पाक इस राह में यह मुसीबतें भेज दे, तो फिर इन को ख़ुदा की रहमत और ज़रीया-ए-कफ़ारा-ए-सय्यिआत व रफ़’अते-दर्जात समझा जाए।
राहे-ख़ुदा में इस क़िस्म की मुसीबतें तो अंबिया और सिद्दीक़ीन व मुक़र्रबीन की ख़ास ग़िज़ाएं हैं।
(ज़रीया-ए-कफ़्फ़ारा-ए-सय्यिआत = गुनाहों के कफ़्फ़ारे का ज़रिया)
(रफ़’अते-दर्जात = दर्जों को बुलंद होना)
(मल्फ़ूज़ात हज़रत मौलाना इल्यास रह़मतुल्लाह अलैह, पेज नंबर. २७)
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