हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी रह़मतुल्लाहि अ़लैह ने एक मर्तबा इरशाद फ़रमाया: “मैं न तकब्बुर को पसंद करता हूँ और न ऐसी तवाज़ु को, जिसमें ज़िल्लत हो। यहाँ न मुतकब्बिरों का गुज़र है और न ऐसे मुतवाज़े (तवाज़ु करने वाले) को जगह मिलती है, जो ज़िल्लत का दर्जा इख़्तियार करे …
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